भारत में गरीबी और भुखमरी की स्थिति – एक कड़वा सच
भारत में गरीबी और भुखमरी की स्थिति – एक कड़वा सच
भारत आज विकास की तेज़ रफ्तार की बातें करता है। भाषणों में, मंचों पर, टीवी की स्क्रीन पर—हर जगह “नया भारत” की तस्वीर दिखाई जाती है। कहा जाता है कि देश डिजिटल हो रहा है, बेरोज़गारी घट रही है, और गरीबी तेजी से कम हो रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में आज भी लाखों लोग ऐसे हैं जिनके लिए एक वक़्त का खाना किसी सपने से कम नहीं। यह भूख केवल पेट की भूख नहीं, यह हमारी सामाजिक संवेदनहीनता, व्यवस्था की विफलता और विकास की असमानता का प्रतीक है।
गरीबी किसी आंकड़े का खेल नहीं होती। यह उन चेहरों पर दिखती है जिनकी आँखों में उम्मीद से ज़्यादा बेबसी होती है। वह उन बच्चों की हड्डियों में दिखती है जो सिर्फ इसलिए कमजोर हैं क्योंकि उन्होंने कई दिन पेट भरकर खाना नहीं देखा। यह उस माँ की सूनी नज़रों में झलकती है जो हर रोज़ यह सोचकर सो जाती है कि कल अपने बच्चों को क्या खिलाएगी।
देश में योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं, बड़े-बड़े प्रोजेक्ट शुरू होते हैं, लेकिन भूख से जूझ रहे लोगों की स्थिति अक्सर वही रहती है। किसी शहर के कोने में एक बच्चा कूड़े के ढेर से कुछ खाने लायक तलाशता है, किसी गाँव में किसान कर्ज और फसल के नुकसान से टूट चुका होता है, और कहीं एक बुजुर्ग भूख से लड़ते-लड़ते हार मान लेता है। यह दृश्य किसी दूर देश की कहानी नहीं, बल्कि हमारे ही आसपास की रोज़मर्रा की सच्चाई है।
हैरानी की बात यह है कि हममें से अधिकांश लोग इन दृश्यों को देखते हैं, पर दो मिनट रुककर महसूस नहीं करते। हम उन्हें अपनी व्यस्तता से अधिक महत्वपूर्ण नहीं मानते। हमारी संवेदनाएँ अब इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि किसी बच्चे की भूख हमें परेशान नहीं करती, लेकिन इंटरनेट धीमा होने पर हम तुरंत शिकायत करने लगते हैं।
व्यवस्था की विडंबना भी कम दिलचस्प नहीं। करोड़ों रुपये की मूर्तियाँ, बड़े-बड़े स्टेडियम, शानदार सरकारी भवन आसानी से बन जाते हैं, लेकिन किसी सरकारी स्कूल के मिड-डे मील में पोषण बढ़ाने के लिए फंड की कमी हो जाती है। हमारे देश में कुत्तों के लिए प्रीमियम फूड खरीदे जाते हैं, लेकिन इंसानों के लिए जूठन भी अक्सर नसीब नहीं होती। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है—क्योंकि जिस समाज में भूख को ‘सामान्य’ माना जाने लगे, वह समाज भीतर से बीमार हो चुका होता है।
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आज समय यह सवाल उठाने का है कि आखिर हमारे विकास का पैमाना क्या है? क्या सड़कें, मॉल, स्मार्टफोन और इंटरनेट ही हमारी प्रगति है? या फिर वह दिन प्रगति का होगा जब कोई बच्चा भूख से नहीं रोएगा, जब कोई माँ अपने बेटे को खाना देने के लिए दूसरों की बची हुई रोटी की ओर न ताकेगी?
हमारे देश में भूख कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन यह तथ्य अवश्य चुभता है कि आज भी इसकी भयावहता वही है, जबकि विज्ञान, तकनीक, खेती और अर्थव्यवस्था—सब कुछ आगे बढ़ चुका है। हमारा देश अनाज का दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक देशों में से एक है, फिर भी भूख से होने वाली मौतें आज भी जारी हैं। यह स्थिति किसी प्राकृतिक अभिशाप की नहीं, बल्कि व्यवस्थागत और सामाजिक विफलता की देन है।
पर समाधान असंभव नहीं। यह सरकार, समाज और आम नागरिक—सभी के संयुक्त प्रयास से बदलेगा। अगर हम अपने आसपास के भूखे लोगों के प्रति थोड़ा संवेदनशील हों, अगर हम भोजन बर्बाद करने से बचें, अगर सामुदायिक भोजन केंद्र बढ़ें, और यदि योजनाएँ कागजों से निकलकर सच में धरातल पर उतरें—तो भूख मिटाई जा सकती है।
भारत को डिजिटल बनाने से ज्यादा ज़रूरी है उसे संवेदनशील बनाना। क्योंकि पेट खाली हो और हाथ में मोबाइल, तो वह विकास नहीं, विडंबना है। हम स्मार्ट इंडिया ज़रूर बनाएं, लेकिन उससे पहले भूख-मुक्त भारत बनाना अधिक आवश्यक है।
भारत में गरीबी और भुखमरी की स्थिति – एक कड़वा सच
मैंने उसे देखा
उसके अंदर की लाचारी को
वह जो बैठी थी
कठोर तपती धरती पर
मैले-फ़टे कपड़ों को
डाले अपने अंतर पर
टूटे बर्तन में किसी की
जूठन को डाले
कमजोर से कंधे पर
मासूम भाई को लादे
दोनों थे शायद
कई दिनों से भूखे
मुकद्दर और भाग्य
दोनों से रूठे
लड़की ने खाना उठाया
खुद से पहले
भाई को खिलाया
वह तो भूख से
बिलबिला रहे थे
और लोग उनपर
खिलखिला रहे थे
किसी ने कहीं से
था खाना दिलाया
अरे! तभी कुत्ते ने
प्लेट को मुँह लगाया
भाई है भूखा
उसे ख्याल आया
निवाले को उसके
मुँह से तुरत लगाया
हाय! विधाता भी है
उस से रूठा
कुत्ता कहीं खाता है बिस्किट
कोई खाता है उसका जूठा
सोचा शायद
यही गरीबी है
इसके नीरस जीवन की
बदनसीबी है
ईश्वर ने भी कैसी
उसकी किस्मत रचाई
हाय! लाज को भी
लाज नहीं आयी
कोई कुत्तो की जूठन से
भूख मिटा रहे हैं
और हम बड़े जोरों से
चीख-चिल्ला रहें हैं
कहते हैं यह है
दुःखमुक्त-ऋणमुक्त भारत
अवश्य बनाइये
डिजिटल युक्त भारत
चलो, पहले बनाते हैं
'भूख' मुक्त भारत
हिंदी स्तंभ

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