भारत का लोकतंत्र: नेता, सरकार या जनता—असली ताकत कौन?

 


                भारत का लोकतंत्र: नेता, सरकार या जनता—असली ताकत कौन?


भारत का लोकतंत्र तीन स्तंभों पर टिका है – नेता, सरकार और जनता। ये तीनों अगर मिलकर चलें तो देश प्रगति की ओर बढ़ता है, लेकिन जब इनके बीच दूरी बढ़ती है, तो विकास थम जाता है।



भारत में नेता, सरकार और जनता लोकतंत्र के तीन मजबूत स्तंभ हैं।


भारत का लोकतंत्र एक दिलचस्प मंच है—जहाँ तीन किरदार हमेशा मौजूद रहते हैं: नेता, सरकार, और जनता
तीनों अपनी-अपनी जगह पर महत्वपूर्ण, पर तीनों एक-दूसरे को समझने में हमेशा नाकाम।
और मज़े की बात?
हर एक को लगता है कि असली ताकत उसी के पास है।

नेता मानते हैं कि जनता को दिशा वही देते हैं।
सरकार सोचती है कि वह देश को चला रही है।
और जनता… जनता हर चुनाव के बाद सोचती है कि शायद इस बार सब बदल जाएगा।

लेकिन हर बार वही पुरानी फ़िल्म—कुछ नए डायलॉग, कुछ नए वादे, और वही अधूरी उम्मीदें।


नेताओं की शक्ति: भाषणों में सबसे मजबूत, फैसलों में सबसे कमजोर

भारत में नेता पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं—
पोस्टरों पर, भाषणों में, और सोशल मीडिया की एडिटेड वीडियो में।

नेता जनता से कहते हैं—
“आप हमारे लिए परिवार जैसे हैं।”
लेकिन अगले ही पल उसी परिवार की बिजली महंगी, पेट्रोल महंगा, और उम्मीदें सस्ती हो जाती हैं।

व्यंग्य यही है कि नेता हर बार कहते हैं “हम बदल देंगे…”
लेकिन बदला सिर्फ उनका काफ़िला, उनका बंगला और उनका प्रभाव दिखता है।
जनता?
वह बस बदलती हुई कीमतें देखती है।


सरकार की शक्ति: फाइलों में सबसे तेज़, ज़मीन पर सबसे धीमी

सरकार एक ऐसी मशीन है जिसमें हजारों पेंच हैं।
ऊपर घूमता है सिस्टम, नीचे पिसती है जनता।
नीतियाँ बनती हैं—
कागज़ों में बेहतरीन,
रियल लाइफ में आधी-अधूरी।

सरकार अपने कामों का बखान करती है—
“इतना कर दिया, इतना कर रहे हैं, इतना करेंगे।”
पर सार्वजनिक अस्पताल की लाइन में खड़े लोग पूछते हैं—
“हमारे हिस्से का कब होगा?”

सरकार पर सवाल उठाओ तो कहा जाता है—
“देश विरोधी मत बनो।”
जैसे कि लोकतंत्र में सवाल पूछना कोई अपराध हो।


जनता की शक्ति: सबसे बड़ी, फिर भी सबसे बिखरी हुई

जनता के पास वोट है—सबसे बड़ा हथियार।
पर हथियार तभी काम आता है जब उसे सही दिशा में चलाया जाए।
जनता भावनाओं से तेज़ी से हिलती है—
कभी धर्म के नाम पर,
कभी जाति के नाम पर,
कभी मुफ्त की योजनाओं के नाम पर।

जनता चाहती है—
सस्ता राशन, सुरक्षित जीवन, अच्छे स्कूल, साफ़ अस्पताल।
लेकिन चुनाव आते ही उसकी प्राथमिकता अचानक बदल जाती है—
और नेता फिर वही पुरानी कहानी सुना देते हैं।

व्यंग्य यही है:
जिस जनता की उंगलियों से सरकारें बनती-बिगड़ती हैं,
उसी जनता की आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है।


तो असली ताकत किसके पास है?

सच तो यह है कि ताकत किसी एक के पास नहीं,
यह एक चक्र है—

  • नेता सत्ता चाहते हैं,

  • सरकार सिस्टम बनाए रखती है,

  • और जनता उम्मीदों से भरी रहती है।

पर लोकतंत्र की असली ताकत वही होगी,
जिस दिन जनता सवाल पूछेगी,
भावनाओं से नहीं, होश से वोट देगी,
और नेता व सरकार यह समझेंगे कि
कुर्सी सेवा के लिए है, शोहरत के लिए नहीं।

उस दिन भारत का लोकतंत्र सिर्फ एक व्यवस्था नहीं,
बल्कि एक जिम्मेदार शक्ति बन जाएगा—
वो शक्ति, जो आज भी खोजी जा रही है।


 कविता-


"नियमित बढ़ता भ्रष्टाचार

वाह रे नेता वाह सरकार।"


घूस में लिपटे रहें निरंतर,

बेशर्मों ओढ़े हर बार।

करें बिचौली जिम्मेदार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


बाढ़ में मचता हाहाकार,

सरकारें बहती मझधार।

करे नकारा फिर भी राज,

वाह रे नेता वाह सरकार।


जाम में फंसते रहें मरीज,

तड़पें सस्पताल में गरीब।

यह जनता कितनी लाचार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


महंगाई का हाल न पूछो,

कारण केवल भ्रष्टाचार।

रोती जनता खुश सरकार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


भविष्य हमारा गढ़ते-गढ़ते,

भूतकाल को आंख दिखाते।

वर्तमान का किया कबाड़,

वाह रे नेता वाह सरकार।


"नियमित बढ़ता भ्रष्टाचार

वाह रे नेता वाह सरकार।"


सचिन "निडर"

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