Indian Village Life - गाँव की सच्चाई, किसान की समस्याएँ और व्यवस्था की अनदेखी




Indian Village Life - गाँव की सच्चाई, किसान की समस्याएँ और व्यवस्था की अनदेखी






 




Indian Village Life - गाँव की सच्चाई, किसान की समस्याएँ और व्यवस्था की अनदेखी


यह लेख और कविता आपको सोचने पर मजबूर कर देगी – अवश्य पढ़ें


भारत के विकास की सड़कें काग़ज़ पर जितनी चौड़ी दिखती हैं, ज़मीन पर उतनी ही टेढ़ी-मेढ़ी हैं—कुछ ऐसी, जैसी किसी गाँव की टूटी हुई पगडंडी, जिस पर सरकारें तो चलते नहीं, लेकिन भाषण ज़रूर बिछा देती हैं। शहरों में चमचमाते मॉल और कैफ़े देखकर लगता है कि देश ‘तेज़ी’ से प्रगति कर रहा है, पर यह प्रगति ठीक वैसी ही है जैसे किसी घर का ड्राइंग रूम चमकता हो और रसोई में बर्तन तक न हों। फर्क बस इतना है कि रसोई की भूमिका हमारे देश में गाँव निभाते हैं, और ड्राइंग रूम शहर।

गाँव—वही जगह जहाँ से भारत का पेट भरने वाले किसान पैदा होते हैं, और उसी मिट्टी से वे बेटे भी पलते-बढ़ते हैं जो आगे चलकर सीमाओं पर खड़े होकर देश की सांसें सुरक्षित रखते हैं। लेकिन मज़े की बात देखिए, देश की नींव यही लोग हैं और असुविधाएँ भी इन्हीं की किस्मत में लिख दी गईं हैं।

गाँवों से निकली शुद्ध हवा को बड़े शहरों में ‘ऑर्गेनिक’ टैग लगाकर बेचा जाता है, और गाँव के बच्चे वो हवा यूँ ही साँसों में भर लेते हैं—क्योंकि उनके पास प्रदूषण करने का समय ही कहाँ? उनके हिस्से तो वक्त आया नहीं है, और सुविधाएँ कभी आई ही नहीं।

लोकतंत्र के नाम पर गाँवों को कभी-कभी याद जरूर किया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे लोग पुराने रिश्तेदारों को दिवाली पर फ़ोन कर लेते हैं... बस औपचारिकता निभाने के लिए। चुनाव आते ही नेता जी ऐसी भाषा बोलते हैं जैसे वे गाँव के ही हों—‘भैया-भैया’ करते हैं, खेतों में फोटो खिंचवाते हैं, बैलों पर हाथ फेरते हैं, और गाँव वालों को यकीन दिलाते हैं कि “इस बार सिस्टम सुधरेगा।” मगर जैसे ही वोट डल जाते हैं, वही सिस्टम गाँव वालों को साबित कर देता है कि सुधार तो हो सकता है—पर दूसरे के लिए, तुम्हारे लिए नहीं।

गाँव का किसान, जिसका पसीना दुनिया का पेट भरता है, वह आज भी मौसम और बाज़ार दोनों के रहमोकरम पर जिंदा है। पैदा वह तब भी करता है, जब बारिश रूठ जाए; काटता वह तब भी है, जब ओलावृष्टि सब तबाह कर दे। फसल बिकती है तो उसे दाम कम मिलते हैं; दाम बढ़ते हैं तो कहा जाता है "महँगाई बढ़ गई है"—पर किसी को यह महँगाई उस किसान की आँखों में दिखती है, जिसे अपनी उपज का मूल्य अपने बच्चों की फ़ीस तक नहीं पहुँचा पाता?

शहरों में बैठकर लोग ‘फ्रेश फार्म फूड’ खाने की डींगे हाँकते हैं, और गाँव में वही किसान है जो जानता तक नहीं कि उसके खेत की सब्जियाँ शहर में ‘प्रीमियम प्रोडक्ट’ के नाम पर कितने में बिक रही हैं। उसकी गरीबी ही उसका गुनाह है और उसकी मेहनत ही उसका क़र्ज़, जो कभी उतरता नहीं।

गाँवों की समस्या सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है। वहाँ सड़कें ऐसे बनती हैं जैसे किसी ने बस मिट्टी पर थूककर उसे पक्का कर दिया हो। बिजली का कनेक्शन ऐसा कि ट्यूब लाइट जल रही है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए रात का अंधेरा जरूरी है। स्कूल ऐसे जहाँ शिक्षक कम और ताले ज़्यादा मिलते हैं। अस्पताल ऐसे जहाँ डॉक्टरों की कुर्सियाँ तो हैं, पर डॉक्टर नहीं।

फिर भी यही गाँव हैं जहाँ से संस्कार उठते हैं, जहाँ से भारत की धरती को अपनी असली पहचान मिलती है। यही ग्रामीण परिवार हैं जो अपने घर के एक बेटे को हल थमाते हैं और दूसरे को देश की सीमा पर भेजते हैं। एक पेट भरने की लड़ाई लड़ता है, दूसरा देश बचाने की। दोनों की मेहनत अमूल्य है, लेकिन बदले में क्या मिलता है? पट्टियाँ, तारीफ़ें और भाषण।

सीमा पर खड़ा जवान, जो गाँव के उसी खेत की धूल में खेलकर बड़ा हुआ है, जहाँ सुबह-सुबह पक्षियों की आवाज़ें अलार्म की जगह काम करती थीं—वह जब अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगाता है, तो पूरे देश को चैन मिलता है। पर उसका अपना गाँव? उसे वही टूटी सड़कें, वही अधूरी योजनाएँ और वही कमज़ोर व्यवस्थाएँ मिलती हैं। राष्ट्रभक्ति का भार उस पर सबसे ज्यादा, और सुविधाएँ सबसे कम।

शहर वाले बड़े गर्व से कहते हैं—“देश आगे बढ़ रहा है।”
गाँव वाले धीरे से मुस्कराते हैं—“किसके कंधों पर?”
यह सवाल पूछने का साहस शहर वालों में कभी नहीं होगा, क्योंकि जवाब बहुत असहज है।

देश की अर्थव्यवस्था बिना घोषणा के गाँवों की तरफ़ से चल रही है। किसान का पसीना, मज़दूर की मजदूरी, और सीमा पर खड़े जवान की जान—इन्हीं तीन स्तंभों पर भारत खड़ा है। लेकिन व्यवस्था? वह इन तीनों को ऐसे ट्रीट करती है जैसे ये बस बैकग्राउंड में खड़े एक्स्ट्रा कलाकार हों, नायक नहीं।

व्यंग्य यह कि सरकारें आएँ या जाएँ, गाँव हमेशा वही रहता है—विकास के वादों का सबसे पहला पोस्टर और सबसे आख़िरी लाभार्थी। किसान हमेशा ‘भविष्य की योजनाओं’ में होता है, वर्तमान में कभी नहीं। जवान हमेशा ‘सल्यूट’ में होता है, सम्मान की व्यवस्था में कभी नहीं।

गाँव की मिट्टी जितनी सोंधी है, उसके लिए शासन उतना ही कठोर।
किसान जितना धैर्यवान है, उसके लिए बाज़ार उतना ही निर्दयी।
जवान जितना बहादुर है, उसके लिए सिस्टम उतना ही बेपरवाह।

और इस सारे नज़ारे के बीच शहर वाले आराम से बैठे हैं, उनका एसी चल रहा है, कॉफी का मग गर्म है और खबरें ताज़ा। वे कहते हैं—“कृषि हमारी रीढ़ है।”
लेकिन रीढ़ का दर्द वे कभी महसूस नहीं कर सकते।

किसानों और जवानों के जीवन की विडंबना यही है कि उनका संघर्ष राष्ट्र निर्माण की जड़ है, लेकिन उनके हिस्से फल नहीं आते। जिन हाथों में हल है और जिन हाथों में हथियार—दोनों को ही बस सम्मान का वादा मिलता है, सुविधा कभी नहीं।

हमारे गाँव भारत का दिल हैं, लेकिन देश को यह याद तभी आता है जब चुनाव पास हों या जब सीमा पर हालात बिगड़ें। बाक़ी दिनों में गाँव बस न्यूज़ चैनल की स्क्रॉल लाइन है—धीमी, छोटी और अक्सर अनदेखी।

अंत में बात सिर्फ इतनी है कि भारत का पेट भरने वाला किसान और भारत की सीमा बचाने वाला जवान—ये दोनों सिर्फ देश की रीढ़ नहीं हैं, देश की असली पहचान हैं। पर सवाल वही कि इन पहचान को बदले में क्या मिलता है? संघर्ष, अनदेखी और एक अंतहीन इंतज़ार।

देश कब सीखेगा कि विकास की असली सड़कें गाँव से गुजरती हैं, शहर से नहीं?
और कब समझेगा कि जिनके त्याग पर देश खड़ा है, उन्हीं के घर सबसे कम मजबूती से खड़े हैं?


भारत का दिल — गाँव की सच्चाई– अवश्य पढ़ें


भारतीय गाँव- कविता

मेरा गाँव 

 


खेतों की मेडों पर चलकर,
छप्पर वाले घर में रहकर,
सोंधी माटी में खेल-खेल,
अगणित देशों में छाये हैं,
हम उन गाँवों से आये हैं।


शुद्ध हवा को दुनियाँ तरसे,
भारत का दिल बनकर धडके,
जल का मोल है प्रेम जहाँ पर,
पहचान साथ में लाये हैं,
हम उन गाँवों से आये हैं।


मुल्कों का जो पेट भरे,
समझौतों में है उम्र कटे,
संस्कार के बीज जहाँ से,
दुनियाँ भर में छाये हैं,
हम उन गाँवों से आये हैं।


कच्चे घर की मजबूत जड़ें,
फसलें जैसे संगीत कहें,
जिनकी तर्ज़ों पर फार्म हॉउस,
भर-भर तुमने खुलवाए हैं,
हम उन गांवों से आये हैं।


तुमने देखे हैं सपनों में,
वह गलियाँ जो हैं अपनों में,
देशप्रेम के गीत जहाँ पर,
सदियों भर से गाये हैं,
हम उन गांवों से आये हैं।


चूल्हे की रोटी स्वाद जगाये,
पंछी के स्वर अलख जगाएं,
गाँव-गाँव से मिलकर बनता,
भारत महान कहलाये है,
हम उन गाँवों से आये हैं।


कोई करनी नहीं खुशामद,
तुझको तेरा शहर मुबारक,
गांव समाया है रूहों मे,
स्थितियां अब तड़पाये है,
हम उन गाँवों से आये हैं।
                  
जो माटी की क्रीड़ाओं पर,
बेटे जिनके सीमाओं पर,
हिन्द की खातिर प्राण तजे,
वह कफ़न तिरंगा लाये हैं,
हम उन गांवों से आये हैं।


हिंदी स्तंभ

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