नेता, सरकार और जनता – भारत के लोकतंत्र की असली ताकत कौन?

 


                          नेता, सरकार और जनता


भारत का लोकतंत्र तीन स्तंभों पर टिका है – नेता, सरकार और जनता। ये तीनों अगर मिलकर चलें तो देश प्रगति की ओर बढ़ता है, लेकिन जब इनके बीच दूरी बढ़ती है, तो विकास थम जाता है।



भारत में नेता, सरकार और जनता लोकतंत्र के तीन मजबूत स्तंभ हैं।



 नेता, सरकार और जनता


भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यह वह देश है जहाँ सत्ता की असली ताकत किसी राजा या शासक के पास नहीं, बल्कि “जनता” के हाथों में होती है। यहाँ जनता वोट देकर यह तय करती है कि देश का नेतृत्व कौन करेगा, नीतियाँ कौन बनाएगा और देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज हमारे लोकतंत्र के तीनों स्तंभ नेता, सरकार और जनता अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभा रहे हैं? अगर इनमें से कोई एक भी कमजोर पड़े, तो पूरा लोकतंत्र डगमगाने लगता है।

यह प्रश्न सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्र के नैतिक चरित्र से जुड़ा है।

भारत में आज लगभग 25 लाख से अधिक जन-प्रतिनिधि (सभी स्तरों पर) कार्यरत हैं। यह संख्या किसी भी देश से कहीं अधिक है। लेकिन इन लाखों में कितने नेता ऐसे हैं जो जनता की आवाज बनकर खड़े होते हैं, यह सोचने वाली बात है। सच्चा नेता वह नहीं जो सिर्फ चुनाव जीत ले बल्कि वह है जो जनसेवा को जीवन का मिशन बना ले। आज आवश्यकता है कि नेता जाति, धर्म या भाषण की राजनीति से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता को प्राथमिकता दें। राजनीति अब विचारधारा से नहीं, बल्कि प्रचार, दिखावे और जाति-धर्म के समीकरणों से चलने लगी है। एक सच्चा नेता वही है जो भाषणों से नहीं, कर्मों से पहचान बनाए। जो जनता की समस्याओं को अपने जीवन का मिशन माने। आज ज़रूरत है ऐसे नेताओं की जो कुर्सी के लिए नहीं, कर्तव्य के लिए राजनीति करें।

सरकार किसी एक व्यक्ति की नहीं होती, यह एक व्यवस्था होती है जो जनता की उम्मीदों पर टिकी रहती है।
सरकार का मूल मंत्र है – “जन-कल्याण”।

लोकतंत्र की असली शक्ति जनता के विवेक और जिम्मेदारी में बसती है। भारत में लगभग 97 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं, परंतु हर चुनाव में औसतन केवल 65-70% लोग वोट डालते हैं। यानी अब भी 30% लोग लोकतंत्र की प्रक्रिया से दूर हैं। जनता को यह समझना होगा कि वोट देना केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। 

जागरूक जनता ही सच्ची सरकार बनाती है।


 कविता-


"नियमित बढ़ता भ्रष्टाचार

वाह रे नेता वाह सरकार।"


घूस में लिपटे रहें निरंतर,

बेशर्मों ओढ़े हर बार।

करें बिचौली जिम्मेदार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


बाढ़ में मचता हाहाकार,

सरकारें बहती मझधार।

करे नकारा फिर भी राज,

वाह रे नेता वाह सरकार।


जाम में फंसते रहें मरीज,

तड़पें सस्पताल में गरीब।

यह जनता कितनी लाचार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


महंगाई का हाल न पूछो,

कारण केवल भ्रष्टाचार।

रोती जनता खुश सरकार,

वाह रे नेता वाह सरकार।


भविष्य हमारा गढ़ते-गढ़ते,

भूतकाल को आंख दिखाते।

वर्तमान का किया कबाड़,

वाह रे नेता वाह सरकार।


"नियमित बढ़ता भ्रष्टाचार

वाह रे नेता वाह सरकार।"


सचिन "निडर"

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