वादों का साम्राज्य, प्रचार का सिंहासन और जवाबदेही का अंतिम संस्कार
भारतीय राजनीती 2014 के सन्दर्भ में हिंदी कविता
एक पुरानी हिंदी कविता जिसे मैंने 2014 चुनाव के पहले लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ। वह एक वदलाव का चुनाव था, एक माहौल का चुनाव था, जो उस समय देश में देखने को मिल रहा था। तत्कालीन सत्ता से लोगों का मोहभंग हो रहा था। ऐसे में वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एक विकल्प के तौर पर उभरे। लोगो ने उनपर भरोसा जताया और सत्ता के शीर्ष पर स्थापित कर दिया।
अब आज का प्रश्न है कि क्या वह उस भरोसे पर खरे उतरे या नहीं? यह मैं आप पर छोड़ता हूँ।
वादों का साम्राज्य, प्रचार का सिंहासन और जवाबदेही का अंतिम संस्कार
भारतीय राजनीति में अतिशयोक्ति कोई नई बात नहीं है। हर चुनाव अपने साथ सपनों की गठरी लेकर आता है। हर नेता भविष्य का एक चमकदार चित्र बनाता है और हर दल जनता को विश्वास दिलाता है कि बस एक अवसर मिल जाए, फिर इतिहास बदल जाएगा। लेकिन 2014 के बाद का राजनीतिक दौर केवल वादों का दौर नहीं था, बल्कि राजनीतिक विपणन (Political Marketing) के सबसे बड़े प्रयोगों में से एक था। यह वह समय था जब भाषणों को उपलब्धियों से बड़ा बना दिया गया, नारों को नीतियों से ऊँचा उठा दिया गया और छवि को वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया।
जनता को बताया गया कि व्यवस्था बदल जाएगी। भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। युवाओं को रोजगार मिलेगा। किसानों की आय बढ़ेगी। महंगाई नियंत्रण में होगी। सरकारी संस्थाएँ अधिक जवाबदेह बनेंगी। राजनीति की संस्कृति बदल जाएगी। देश एक नए युग में प्रवेश करेगा।
लेकिन एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या बदला?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या उन लोगों से कभी जवाब माँगा गया जिन्होंने ये दावे किए थे?
लोकतंत्र में वादा करना अधिकार है, लेकिन उसका हिसाब देना कर्तव्य है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में राजनीति ने अधिकार तो संभाल लिया, लेकिन कर्तव्य को धीरे-धीरे त्याग दिया।
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वादों की ऊँचाई और वास्तविकता की जमीन
राजनीति में उम्मीदें बेचना सबसे आसान काम है। कोई लागत नहीं, कोई जीएसटी नहीं, कोई गारंटी नहीं। केवल मंच चाहिए और माइक चाहिए।
जनता को बताया गया कि रोजगार की बाढ़ आने वाली है। लाखों-करोड़ों अवसर पैदा होंगे। युवाओं को देश छोड़कर नौकरी खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल निकली।
आज भी देश में रोजगार सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक चुनौती बना हुआ है। स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों और श्रम विशेषज्ञों ने कई बार यह चिंता जताई है कि आधिकारिक बेरोजगारी दर पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। समस्या केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि अधरोज़गारी (Underemployment) और कम आय वाले रोजगारों की भी है। लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अस्थायी नौकरियों, ठेका रोजगार या प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता में फँसे हुए हैं।
यह एक विचित्र स्थिति है।
देश में डिग्रियाँ बढ़ रही हैं।
कोचिंग संस्थान बढ़ रहे हैं।
प्रतियोगी परीक्षाएँ बढ़ रही हैं।
लेकिन स्थायी अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे।
ऐसा लगता है मानो विकास की ट्रेन तो दौड़ रही है, लेकिन उसके डिब्बों में बैठने की जगह सीमित है।
किसानों की आय : वादा बड़ा, संघर्ष बरकरार
ग्रामीण भारत को बताया गया था कि किसान देश की प्राथमिकता होंगे। आय बढ़ेगी। जीवन स्तर सुधरेगा।
लेकिन आज भी कृषि क्षेत्र की वास्तविक चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं।
कई रिपोर्टों में यह सामने आया कि ग्रामीण मजदूरी वृद्धि लंबे समय तक कमजोर रही। अनेक परिवारों की आय इसलिए बढ़ती दिखाई दी क्योंकि परिवार के अधिक सदस्य काम करने लगे, न कि इसलिए कि प्रति व्यक्ति कमाई में कोई असाधारण उछाल आया।
यह विकास का वह मॉडल है जिसमें आँकड़े मुस्कुराते हैं लेकिन आदमी थका हुआ दिखाई देता है।
गाँवों में आज भी खेती मौसम, बाजार और लागत के त्रिकोण में फँसी हुई है।
राजनीतिक भाषणों में किसान "अन्नदाता" है।
लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था में वह अभी भी जोखिम का सबसे बड़ा बोझ उठाने वाला वर्ग है।
महंगाई : आँकड़ों की नहीं, रसोई की कहानी
सरकारी रिपोर्टें कुछ भी कहें, महंगाई का सबसे बड़ा सर्वेक्षण रसोईघर में होता है।
किसी अर्थशास्त्री की तालिका से पहले गृहिणी का बजट सच्चाई बताता है।
जब सिलेंडर महँगा लगे।
जब बच्चों की फीस बढ़े।
जब दवाइयों का खर्च बढ़े।
जब किराया बढ़े।
जब बचत कम हो जाए।
तब जनता को यह समझाने का कोई अर्थ नहीं कि महंगाई नियंत्रित है।
महंगाई का दर्द प्रतिशत में नहीं, जीवन स्तर में महसूस होता है।
यही कारण है कि राजनीतिक भाषणों और आम नागरिक के अनुभव के बीच दूरी लगातार बढ़ती गई।
भ्रष्टाचार समाप्त हुआ या केवल उसका स्वरूप बदला?
सबसे बड़ा वादा था—भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार।
जनता ने विश्वास भी किया।
लेकिन वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार की शिकायतें समाप्त नहीं हुईं।
हाँ, उसके तरीके बदले, उसकी भाषा बदली, उसका स्वरूप बदला।
लेकिन क्या वह पूरी तरह समाप्त हुआ?
यदि नहीं, तो फिर उन वादों का क्या हुआ जिन्हें अंतिम समाधान की तरह प्रस्तुत किया गया था?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा धोखा झूठ नहीं होता।
सबसे बड़ा धोखा वह दावा होता है जो स्वयं को अंतिम सत्य घोषित कर दे।
नोटबंदी : त्याग जनता का, लाभ किसका?
जब बड़े निर्णय लिए गए तो जनता से त्याग माँगा गया।
कहा गया कि कुछ समय की परेशानी देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है।
लोग घंटों लाइनों में खड़े रहे।
छोटे व्यापार प्रभावित हुए।
असंगठित क्षेत्र को झटका लगा।
लेकिन वर्षों बाद भी अर्थशास्त्रियों के बीच यह बहस जारी रही कि उस निर्णय ने वास्तव में अपने घोषित उद्देश्यों को कितना हासिल किया।
राजनीति का एक पुराना नियम है—
जब परिणाम कमजोर हों तो त्याग की कहानी मजबूत बनाई जाती है।
लोकतंत्र से डिजिटल दरबार तक
शायद सबसे बड़ा परिवर्तन यहीं हुआ।
पहले नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे।
अब वीडियो संदेश जारी करते हैं।
पहले पत्रकार सवाल पूछते थे।
अब सोशल मीडिया टीम सामग्री तैयार करती है।
पहले संवाद होता था।
अब प्रसारण होता है।
पहले नेता जनता को सुनते थे।
अब जनता को सामग्री दिखाई जाती है।
लोकतंत्र धीरे-धीरे संवाद से प्रचार की ओर खिसकता चला गया।
सोशल मीडिया का उपयोग लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए होना चाहिए था।
लेकिन कई बार वह जवाबदेही से बचने का साधन बनता दिखाई दिया।
फॉलोअर्स बढ़े, जवाबदेही घटी
भारत आज दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया बाजारों में से एक है।
करोड़ों लोग प्रतिदिन राजनीतिक सामग्री देखते हैं।
लेकिन क्या इससे लोकतंत्र मजबूत हुआ?
जरूरी नहीं।
लोकतंत्र की गुणवत्ता लाइक्स से नहीं मापी जाती।
फॉलोअर्स से नहीं मापी जाती।
ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं मापी जाती।
लोकतंत्र केवल एक सवाल पूछता है—
"क्या सत्ता जनता के प्रश्नों का उत्तर दे रही है?"
यदि उत्तर नहीं है, तो करोड़ों फॉलोअर्स भी लोकतांत्रिक कमी को नहीं छिपा सकते।
संसद : बहस का मंच या औपचारिकता?
लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च संस्था मानी जाती है।
यहीं प्रश्न पूछे जाते हैं।
यहीं जवाब दिए जाते हैं।
यहीं नीतियों की जाँच होती है।
लेकिन पिछले वर्षों में बार-बार यह चिंता व्यक्त की गई कि विधेयकों पर विस्तृत चर्चा और संसदीय समितियों द्वारा परीक्षण की परंपरा कमजोर हुई है।
जब कानून तेजी से पारित होते हैं लेकिन उन पर पर्याप्त बहस नहीं होती, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ती है।
कानून का महत्व केवल उसके पारित होने में नहीं है।
उसकी वैधता उस चर्चा से आती है जो उसके पहले हुई हो।
असहमति : लोकतंत्र की ताकत या अपराध?
लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब कोई सरकार की आलोचना करता है।
प्रशंसा तो हर सत्ता सुनना चाहती है।
लेकिन आलोचना?
वहीं से लोकतंत्र की गुणवत्ता तय होती है।
पिछले वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई कि असहमति को कई बार देशहित बनाम विरोध के चश्मे से देखा जाने लगा।
सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है।
सरकार की आलोचना लोकतंत्र की आवश्यकता है।
लेकिन जब आलोचक को दुश्मन और समर्थक को देशभक्त मानने की आदत विकसित हो जाए, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे व्यक्तिपूजा में बदलने लगता है।
मीडिया : चौथा स्तंभ या प्रतिध्वनि कक्ष?
मीडिया का कार्य है सत्ता से सवाल पूछना।
लेकिन आज अक्सर यह आरोप सुनाई देता है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता और जनता के बीच पुल बनने के बजाय प्रचार और जनमत निर्माण का उपकरण बनता जा रहा है।
रात की बहसें चीखों में बदल गईं।
तथ्यों की जगह भावनाएँ आ गईं।
रिपोर्टिंग की जगह प्रदर्शन आ गया।
और पत्रकारिता कई बार मनोरंजन उद्योग की शाखा जैसी दिखाई देने लगी।
लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।
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सबसे बड़ा संकट : स्मृति का क्षरण
राजनीति जानती है कि जनता की याददाश्त सीमित होती है।
इसलिए हर नए चुनाव में नए नारे आते हैं।
नए वादे आते हैं।
नए अभियान आते हैं।
लेकिन लोकतंत्र तभी परिपक्व होता है जब नागरिक पुराने वादों का हिसाब माँगते हैं।
यदि हर चुनाव केवल नए सपनों पर लड़ा जाएगा और पुराने दावों की समीक्षा नहीं होगी, तो जवाबदेही का विचार ही समाप्त हो जाएगा।
आज का सबसे बड़ा प्रश्न
देश बदला है।
सड़कें बनी हैं।
डिजिटल सेवाएँ बढ़ी हैं।
तकनीकी प्रगति हुई है।
यह सब स्वीकार करना चाहिए।
लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी पूछना चाहिए—
क्या बदलाव उतना बड़ा था जितना बताया गया था?
क्या परिणाम उतने ऐतिहासिक थे जितने दावे किए गए थे?
क्या जनता को उतना मिला जितना वादा किया गया था?
और सबसे महत्वपूर्ण—
यदि वादे पूरे नहीं हुए तो जिम्मेदार कौन है?
यही वह प्रश्न है जिससे आधुनिक राजनीति सबसे अधिक बचना चाहती है।
क्योंकि आज का राजनीतिक मॉडल उपलब्धियों से कम और कथानक (Narrative) से अधिक संचालित होता है।
यदि कहानी मजबूत है तो वास्तविकता कमजोर होने पर भी काम चल जाता है।
यदि प्रचार शक्तिशाली है तो प्रदर्शन की कमी छिप जाती है।
यदि सोशल मीडिया सक्रिय है तो जवाबदेही को पीछे धकेला जा सकता है।
लेकिन इतिहास सोशल मीडिया पर नहीं लिखा जाता।
इतिहास विज्ञापन एजेंसियाँ नहीं लिखतीं।
इतिहास ट्रेंडिंग हैशटैग नहीं लिखते।
इतिहास केवल एक प्रश्न पूछता है—
"जो कहा था, क्या वह किया?"
और यदि उत्तर अस्पष्ट है, तो चाहे प्रचार कितना भी विशाल क्यों न हो, समय अंततः अपना निर्णय सुना देता है।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता देर से जाग सकती है, लेकिन हमेशा के लिए सोती नहीं।
और जब जनता जागती है, तो वह तालियाँ नहीं, हिसाब माँगती है।प्रस्तुत है 2014 राजनीती के सन्दर्भ में हिंदी कविता।
भारतीय राजनीती 2014 के सन्दर्भ में हिंदी कविता
HINDI POEM ON INDIAN POLITICS 2014
यह सारे ज़माने से कहना पड़ेगा,
है अब देश जागा समझना पड़ेगा।
थमीं डोर रावी की जोगी के हाथों,
स्वर्णिम समय है अब भारत का।
समझने लगो रूख इशारों में भाई,
यह अंबर, यह धरती बदलती हवा का।
हैं आका बहुत आये आकर गए हैं,
हिन्दुत्व ऋणी है एक बेटे नमों का।
बड़ी ही अजब है यह दुनियां हमारी,
युगों में है भागी पुरानी बीमारी।
कहीं ले न आना फिर से वही दिन,
चलने लगेगी घोटालों की आंधी।
उदय हो चूका है बुलंदी का सूरज,
अँधेरी घटायें है डर-डर के भागीं।
मेरा साथ पूरा है मेरे वतन को,
ख़तम कर दो सारी कमाई वो काली।
मगर एक शिकायत है मेरी भी सुनलें,
जिसे हर तरफ हर जगह में कहूंगा।
जनता के सेवक हो सेवक ही रहना,
इसके लिए कुछ भी सहता रहूंगा।
मेरी जंग केवल नकारों से होगी,
हमेशा धरा पर उतरता रहूंगा।
नहीं डर है कोई हुकूमत का मुझको,
निडर था, निडर हूँ, निडर ही रहूंगा।
सचिन "निडर"

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