भारत का टैक्स सिस्टम – एक सच्चा व्यंग्यात्मक विश्लेषण
भारत की अर्थव्यवस्था हर साल नई ऊँचाइयों का सपना दिखाती है, लेकिन आम आदमी की जेब वही पुराना बोझ उठाए खड़ी रहती है। टैक्स के नियम बदलते रहते हैं, स्लैब बदलते हैं, घोषणाएँ बदलती हैं—लेकिन आम नागरिक की मुश्किलें नहीं बदलतीं। यह लेख भारत की टैक्स प्रणाली, उसकी जटिलताओं और आम लोगों की परेशानियों पर एक व्यंग्यात्मक, लेकिन बेहद वास्तविक नज़र देता है। पढ़ते-पढ़ते शायद आपको कहीं-न-कहीं अपना दर्द भी दिखाई दे।
भारत में कर प्रणाली : आम आदमी की जेब, सरकार की सेहत और न खत्म होने वाली उलझनें
भारत का टैक्स सिस्टम किसी भूल-भुलैया से कम नहीं है। एक आम नागरिक, जो सुबह-सुबह उठकर भीड़भाड़ में ठुसे हुए ऑटो में दफ्तर पहुँचता है, वही देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी माना जाता है… और सबसे ज़्यादा निचोड़ा भी जाता है। ऐसा लगता है कि भारत में टैक्स सिर्फ सरकार का अधिकार नहीं, बल्कि एक परंपरा है—और आम आदमी इस परंपरा का स्थायी मेहमान।
कहने को तो भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन जब जेब से पैसे जाने की बात आती है तो लगता है कि यह विकास आम आदमी के घर के सामने से होकर तो गुज़रता है, पर अंदर आने की हिम्मत नहीं कर पाता। ऑर्गनाइज़्ड सेक्टर के मात्र 6–7 प्रतिशत लोग इनकम टैक्स देते हैं और GST के जरिए हर खरीदारी पर टैक्स चुकाते हैं—चाहे वह दूध का पैकेट हो, साबुन हो या फिर मोबाइल रिचार्ज।
GST ने पूरी व्यवस्था को "वन नेशन वन टैक्स" का सपना दिखाया, लेकिन जमीन पर उतरा तो यह "वन नेशन, मल्टीपल स्लैब्स" बन गया। 0, 5, 12, 18, 28 प्रतिशत—और ऊपर से सेस। आम आदमी जब बिल देखता है तो उसे सामान की कीमत कम और टैक्स का हिस्सा ज्यादा दिखाई देता है।
और टैक्स सिर्फ जीते-जी नहीं लिया जाता। लोग मजाक में कहते हैं कि भारत में इंसान पैदा होते ही टैक्स देना शुरू कर देता है और मरने तक देता है। अब यह मजाक भी हकीकत के करीब है—कफ़न पर भी GST लगता है। यह अलग बात है कि कुछ राज्यों ने इसे घटाया या खत्म किया, लेकिन मूल संदेश साफ है—"मरने पर भी सिस्टम आपको मुफ्त में जाने नहीं देगा।"
दूसरी तरफ सरकार का रवैया बिल्कुल अलग है। योजनाओं के विज्ञापन, उद्घाटन, घोषणा, भाषण, वादे—सबकुछ चमकदार। टीवी पर विज्ञापन देखो तो लगता है कि देश में हर चीज मुफ्त हो चुकी है। लेकिन बिलकुल उसी समय आपके फोन में बिजली बिल, पानी बिल, LPG सब्सिडी का संदेश आता है और आपकी आँखें खुद ही पूछ लेती हैं—"अच्छा! मुफ्त क्या है आखिर?"
अब जरा दुनिया की ओर देखें। कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ इनकम टैक्स ही नहीं है—जैसे कि संयुक्त अरब अमीरात और क़तर । यहाँ सरकार टैक्स नहीं वसूलती, लेकिन नागरिकों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएँ देती है। वहाँ की सरकारें मानती हैं कि नागरिकों को कम कमाने से नहीं, अच्छा जीवन देने से देश आगे बढ़ता है। नागरिक कमाएँ, खर्च करें, खुश रहें—इसी में देश का विकास है।
इसके मुकाबले भारत में ऐसा लगता है कि सरकार और आम आदमी के बीच एक अघोषित संबंध है—आम आदमी कमाए, सरकार खर्च करे, और बीच में जो बचे उसे ‘विकास’ कहा जाए। यहाँ टैक्स की जटिलता इतनी है कि एक प्लम्बर अपना रिंच ठीक से नहीं पकड़ पाता, लेकिन उसकी कमाई पर टैक्स का हिसाब ठीक बैठाना जरूरी है। छोटी दुकान चलाने वाला व्यक्ति GST रिटर्न के चक्कर में इतना उलझ जाता है कि उसे लगता है दुकान चलाना आसान है, टैक्स चलाना मुश्किल।
इनकम टैक्स की दलीलों में अक्सर कहा जाता है कि देश को चलाने के लिए पैसे चाहिए। यह बात सही है। लेकिन सवाल यह है कि खर्च कहाँ हो रहा है? सड़कों पर गड्ढे हैं, अस्पतालों में लाइनें हैं, सरकारी दफ्तरों में फाइलें हैं और शिक्षा में अभाव। यानी पैसा जाता है, पर पहुँचता कहाँ है यह एक रहस्य है।
आम आदमी के लिए टैक्स का हर नियम एक नई मुश्किल लेकर आता है। वह अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में देता है और बदले में भीड़भाड़ वाली बसें, उबड़-खाबड़ सड़कें, और अस्पताल में लंबी कतारें मिलती हैं। महीने के अंत में जब वह अपने बैंक बैलेंस को देखता है, तो लगता है कि यह बैंक उसका नहीं, सरकार का है—वह सिर्फ इसमें पैसे डालने का जिम्मेदार है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि टैक्स नियम बदलते रहते हैं, लेकिन आम आदमी की स्थिति नहीं बदलती। स्लैब बदलता है, छूट बदलती है, सिस्टम अपडेट होता है, फॉर्म का डिजाइन नया आता है—but आम आदमी की परेशानी जस की तस। उल्टा, जब भी कोई सुधार होता है, नया नियम आता है, तो उसे अपनाने में वही व्यक्ति सबसे ज्यादा झुलसता है जो पहले ही परेशान है।
भारत में टैक्स सिर्फ कानून नहीं, बल्कि एक अनुभव है—जैसे कि ट्रैफिक, गर्मी, और भीड़। न चाहते हुए भी इसे झेलना पड़ता है। सरकारें बदलती हैं, भाषण बदलते हैं, लेकिन टैक्स का बोझ नहीं बदलता। सरकार कहती है—"देश आगे बढ़ रहा है", और आम आदमी कहता है—"मेरी जेब पीछे रह गई है।"
फिर भी भारत का आम नागरिक धैर्य रखता है। वह विश्वास करता है कि शायद किसी दिन उसका टैक्स उसके जीवन को आसान बनाएगा। शायद कभी अस्पतालों की हालत सुधरेगी, शायद सड़कें सचमुच स्मूद होंगी, शायद बिजली बिल स्थिर रहेगा, शायद GST के स्लैब कम होंगे, शायद इनकम टैक्स की सीमा बढ़ेगी। शायद…
भारत में टैक्स देना एक ऐसी परंपरा है, जिसे लेकर सरकार उतनी ही उत्साहित रहती है जितना आम आदमी उससे घबराया हुआ।
और ये घबराहट बेवजह भी नहीं—क्योंकि यहाँ इंसान कमाने से पहले सपने देखता है, और कमाने के बाद टैक्स की कटौती।
कहावत है—
“भारत में आप चाहे जो बनें, टैक्सदाता बनना अनिवार्य है।”
आदमी पैदा होता है—दूध पर GST।
बड़ा होता है—कपड़ों पर GST।
कमाने लगता है—आयकर।
गाड़ी ले—रोड टैक्स।
मर जाए—कफ़न-सामग्री पर अप्रत्यक्ष टैक्स।
यानी जन्म से मृत्यु तक सरकार आपकी जेब से सीधे संबद्ध रहती है।
आयकर : कमाई आपकी, हिसाब उनका
भारत में सिर्फ़ 8% लोग ही आयकर भरते हैं, पर देश का 70% टैक्स इन्हीं 8% से आता है।
यानी कम लोग, ज्यादा बोझ — और उसी बोझ को “राष्ट्रनिर्माण” कहकर रोमांटिक बना दिया जाता है।
Income Tax Department हर साल स्लैब में सुधार की बात करता है… पर सुधार जितनी बार आता है, उससे ज़्यादा बार “प्रक्रिया में है” सुनाई देता है।
सैलरी स्लिप देखकर आदमी अक्सर यही कहता है—
“मैं नौकरी कर रहा हूँ या सरकार का गोल्ड मेंबरशिप प्लान भर रहा हूँ?”
आयकर की दिक्कतें अलग—
Form 16 देर से मिले,
Portal hang,
Login failed,
Refund कहीं फँसा,
और Customer Care सिर्फ़ एक लाइन—
“कृपया प्रतीक्षा करें…”
समस्या जनता की होती है,
और समाधान का दावा सरकार का।
GST
2017 में GST Council ने GST लाँच किया और कहा—
“अब सभी टैक्स सरल होंगे।”
पर परिणाम?
टूथपेस्ट 18%,
जूते 5% और 18% दोनों,
रेट बदलते रहते हैं,
स्लैब इतने कि आदमी सोचता है—
“अगर GST समझ गया, तो जिंदगी की बाकी समस्याएँ आसान हो जाएँगी।”
दुकानदार का दर्द और गहरा—
रिटर्न भरने में आधी ज़िंदगी निकल जाती है।
कैशियर का काम कम और पोर्टल से लड़ाई ज्यादा।
सरकार कहती है—“हमने सिस्टम सरल किया है।”
वह कहता है—“सरल तो मेरा धैर्य भी नहीं है।”
पेट्रोल–डीज़ल : सरकार का सबसे प्यारा ATM
भारत दुनिया में उन देशों में है जहाँ ईंधन पर टैक्स सबसे ज्यादा है।
एक आम आदमी 2000 का पेट्रोल भरवाए तो 800–900 रुपये सिर्फ़ टैक्स में चले जाते हैं।
सड़कें?
उनका हाल इतना विडंबनापूर्ण है कि ऐसा लगे जैसे टैक्स सड़क बनाने में नहीं, गड्ढों के संरक्षण विभाग में लगा हो।
तुलना : जहाँ टैक्स देने से सुविधा मिलती है और जहाँ सुविधा खोजनी पड़ती है
अमेरिका
टैक्स कम, सुविधाएँ बेहतरीन — सड़कें, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सब top-class।
जापान
टैक्स ज्यादा, लेकिन सेवाएँ इतनी शानदार कि आदमी टैक्स देने में भी मुस्कुराए।
भारत
टैक्स बहुत ज्यादा,
सुविधाएँ — “जल्द आएंगी”, “विकास प्रक्रिया में है”, “डाटा संकलित किया जा रहा है”…
आम आदमी की उम्मीदें भी अब Pending Status में।
कफ़न पर भी टैक्स : अंतिम यात्रा भी महँगी
यह सुनकर दुख होता है, पर भारत में अंतिम संस्कार की सामग्री—
लकड़ी, घी, कपड़ा, फूल, अगरबत्ती—
अलग-अलग GST स्लैब में आती हैं।
यानी आदमी मर भी जाए तो सरकार आख़िरी बार कान में फुसफुसाती है—
“भाई थोड़ा योगदान और…”
इससे बड़ा व्यंग्य और क्या कि
एक भारतीय जीवन भर टैक्स देता है और मरने के बाद भी उससे जुड़े खर्चों पर सरकार का हिस्सा शामिल होता है।
दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहाँ इनकम टैक्स का नाम तक नहीं।
जैसे—
United Arab Emirates
Qatar
Saudi Arabia
Bahrain
Kuwait
Oman
Monaco
Bahamas
Bermuda
इन देशों में सैलरी पूरी की पूरी आपकी—
न TDS,
न रिटर्न,
न पोर्टल,
न स्लैब।
भारत का आम आदमी यह सूची देखकर सोचता है—
“ये लोग तो वेतन लेते ही अमीर हो जाते होंगे… और हम तो टैक्स देखकर ही गरीब लगने लगते हैं।”
income tax, GST की समस्याएँ जनता की… और सरकार? सरकार तो ठीक है
यहाँ असली व्यंग्य शुरू होता है।
समस्याएँ—
Portal नहीं खुल रहा
Return अटका
Form गलत
Mismatch
Refund Pending
इन सबसे कौन परेशान?
जनता।
और सरकार?
आंकड़े दिखाती है—Revenue बढ़ गया, Compliance बढ़ गया…
जनता कहती है—
“हमने मुश्किलें बढ़ाकर ये आँकड़े दिये हैं।”
सरकार कहती है—
“हमने सुधार करके आपको सुविधा दी है।”
आम आदमी की जेब पतली,
सरकार की फाइलें मोटी,
और इन दोनों के बीच में बस टैक्स का पुल।
आम आदमी का जीवन : टैक्स, EMI और उम्मीद का त्रिकोण
भारतीय नागरिक की पूरी जिंदगी—
टैक्स दो,
EMI भरो,
उम्मीद रखो।
हर महीने अदायगी, हर साल बजट।
और उम्मीद कि “इस बार कुछ सस्ता होगा।”
लेकिन सस्ता होता है?
सिर्फ़ धैर्य।
बाकी सब महँगा।
आम आदमी बस यही सोचता है—
“मेरी गलती बस इतनी है कि मैं कमाता हूँ।”
टैक्स जरूरी है, लेकिन न्याय भी जरूरी है
देश टैक्स से चलता है,
लेकिन टैक्स चुकाने वाला भी इंसान है—
ATM नहीं।
जब तक कर प्रणाली
साफ़, सरल, पारदर्शी और इंसाफ़ वाली नहीं होगी,
देश का आम आदमी अपनी कमर सहलाते हुए यही कहता रहेगा—
“सरकार साहब, टैक्स ले लो…
बस मेरी ज़िंदगी थोड़ा आसान कर दो।”
भारत की कर प्रणाली पर बहस आज की नहीं, दशकों पुरानी है। सरकारें बदलीं, नीतियाँ बदलीं, स्लैब बदले—पर जेब का दर्द नहीं बदला। हर साल बजट में उम्मीद जगाई जाती है कि शायद इस बार टैक्स आसान होगा, शायद इस बार जेब पर बोझ कम होगा, लेकिन यह उम्मीद अक्सर अगले बजट तक टल जाती है। आम आदमी फिर भी विश्वास बनाए रखता है कि एक दिन यह सिस्टम सच में उसके लिए काम करेगा। तब तक, वह टैक्स भी देगा, बिल भी भरेगा और देश के विकास के सपने भी देखता रहेगा—क्योंकि भारतीय होने का यही तो अर्थ है।
हिन्दी स्तंभ

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