21वीं सदी का राष्ट्रवाद और हिंदुत्व: आदर्श या राजनीतिक औज़ार?

 

21वीं सदी का राष्ट्रवाद और हिंदुत्व: आदर्श या राजनीतिक औज़ार?


Nationalism and Hindutva,



21वीं सदी की राजनीति, समाज और संस्कृति को समझने के लिए अगर कोई दो शब्द सबसे अधिक प्रभावशाली हैं, तो वे हैं – “राष्ट्रवाद” और “हिंदुत्व”। ये दोनों शब्द मात्र राजनीतिक नारे या वैचारिक गढ़नाएँ नहीं हैं, बल्कि भारत की सामूहिक चेतना, संघर्ष और आत्मपरिचय से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज के समय में चाहे चुनावी मंच हो, मीडिया विमर्श हो या फिर आम जनता की रोज़मर्रा की बातचीत – राष्ट्रवाद और हिंदुत्व दोनों ही एक केंद्रीय स्थान पर हैं।

लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि – क्या यह राष्ट्रवाद और हिंदुत्व वास्तव में आदर्श हैं, जो समाज को एक नई दिशा देते हैं? या फिर ये महज़ राजनीतिक औज़ार बनकर सत्ता हासिल करने और लोगों को विभाजित करने का साधन भर रह गए हैं?

भारत एक ऐसा देश है जिसकी पहचान विविधता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों से होती है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में "राष्ट्रवाद" और "हिंदुत्व" जैसे शब्दों का ऐसा राजनीतिक उपयोग हुआ है कि इनका मूल भाव ही गुम होता जा रहा है। इन शब्दों को अब कई बार "देशभक्ति" और "धार्मिक पहचान" की बजाय, राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। 


क्या यह परिवर्तन लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है?


राष्ट्रवाद: भावना से राजनीतिक रणनीति तक


भारत में राष्ट्रवाद की जड़ें मुख्यतः औपनिवेशिक शासन के विरोध में पनपीं। अंग्रेज़ों ने जब भारत पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित किया, तब भारतीय समाज में “अपनी पहचान” और “अपनी एकता” की खोज ने राष्ट्रवादी चेतना को जन्म दिया।

  • 1857 का विद्रोह, जिसे पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, राष्ट्रवाद का प्रारंभिक प्रतीक बना।

  • आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) ने इस चेतना को संगठित रूप दिया।

भारतीय राष्ट्रवाद कोई एकरूप नहीं था, बल्कि इसमें कई धाराएँ थीं:

  • उदारवादी राष्ट्रवाद : दादाभाई नौरोजी, गोखले जैसे नेता जिन्होंने संवैधानिक सुधार और क्रमिक स्वतंत्रता पर ज़ोर दिया।

  • क्रांतिकारी राष्ट्रवाद : भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु आदि जिन्होंने सशस्त्र संघर्ष और बलिदान की राह चुनी।

  • गांधीवादी राष्ट्रवाद : अहिंसा, सत्याग्रह और जन-आंदोलन पर आधारित।

  • धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : आर्य समाज, हिंदू महासभा जैसी धाराएँ जिन्होंने सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से राष्ट्र को परिभाषित किया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद का आदर्श चरम पर था। “भारत माता” को प्रतीक बनाकर, “वंदे मातरम्” और “जय हिंद” जैसे नारों ने जनता को एकजुट किया। लेकिन इसी दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता और विभाजन के सवालों ने राष्ट्रवाद को गहरे संकट में भी डाला। अंततः 1947 में स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन विभाजन की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रवाद की धारणाएँ भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वमान्य नहीं थीं।

राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक जड़ों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि यह केवल राजनीतिक सत्ता पाने का औज़ार नहीं था, बल्कि एक चेतना और आंदोलन था, जिसने भारतीय समाज को संगठित किया। लेकिन इसकी विविधता और अंतर्विरोधों ने भविष्य में इसे अलग-अलग अर्थों में ढाला – कभी समावेशी और प्रगतिशील, तो कभी संकीर्ण और बहिष्कृत करने वाला।


बदलाव की शुरुआत:

आज का राष्ट्रवाद: “ सत्ता से सवाल पूछने वाला = गद्दार”

2014 के बाद से “राष्ट्रवाद” का प्रयोग एक राजनीतिक रक्षा कवच की तरह होने लगा। सत्ता से सवाल पूछने वाला व्यक्ति टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल, देशद्रोही करार दिया जाने लगा।

जनता का ध्यान मूल मुद्दों — जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य — से हटाकर भावनात्मक राष्ट्रभक्ति पर केंद्रित किया गया।

हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म:

 मूल हिंदू धर्म:

सहिष्णुता, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता, विविध मतों का स्वागत

आज का हिंदुत्व:

सत्ता और बहुसंख्यक प्रभुत्व का माध्यम

“हिंदू खतरे में है” जैसे भय का निर्माण

मीडिया, सोशल मीडिया और भविष्य की दिशा
21वीं सदी में मीडिया और सोशल मीडिया ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को जनता तक पहुँचाने का सबसे शक्तिशाली माध्यम बना दिया है।
(क) पारंपरिक मीडिया
(ख) सोशल मीडिया का प्रभाव
(ग) डिजिटल राजनीति

2. जनता की मनोविज्ञान पर प्रभाव

3. भविष्य की दिशा
(क) संभावनाएँ
(ख) चुनौतियाँ
(ग) समाधान और सुझाव

4. निष्कर्ष

  • समाचार चैनल, अख़बार और रेडियो ने राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श को आकार दिया।

  • राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के प्रतीक, भाषण, रैलियाँ और आयोजन व्यापक दर्शक तक पहुँचते हैं।

  • कभी यह सामाजिक चेतना को बढ़ावा देता है, तो कभी राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को सरल और ध्रुवीकृत रूप में प्रस्तुत करता है।

  • फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म ने सूचना का फैलाव और वायरल होने की गति बढ़ा दी।

  • छोटी-छोटी पोस्ट, मीम्स, वीडियो और संदेश जनता की भावनाओं पर सीधे असर डालते हैं।

  • कभी यह सामाजिक चेतना और पहचान को मजबूत करता है, तो कभी विरोधियों और अलग सोच रखने वालों को हाशिए पर डालने का माध्यम बन जाता है।

  • राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया का प्रयोग चुनावी रणनीति और पहचान निर्माण के लिए कर रहे हैं।

  • प्रचार में भावनात्मक, सांस्कृतिक और धार्मिक तत्वों का इस्तेमाल बढ़ गया।

  • इसके परिणामस्वरूप जनता की राजनीतिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता अधिक प्रभावित होती है।

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का लगातार प्रचार जनता की सोच और व्यवहार पर गहरा असर डालता है:

  1. सकारात्मक प्रभाव

    • सांस्कृतिक और राष्ट्रीय गौरव की भावना बढ़ती है।

    • समाज में एकजुटता और पहचान की भावना विकसित होती है।

    • युवा पीढ़ी में देशभक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जागृत होती है।

  2. नकारात्मक प्रभाव

    • बहुलता और असहमति को कम महत्व देना।

    • “हम बनाम वे” की मानसिकता से सामाजिक विभाजन बढ़ना।

    • आलोचनात्मक सोच और बहस की जगह ध्रुवीकरण और विरोध की नकारात्मक भावना बढ़ती है।

  • यदि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व आदर्श रूप में इस्तेमाल किए जाएँ, तो ये समाज में सांस्कृतिक गौरव, सामाजिक जिम्मेदारी और एकता को बढ़ावा दे सकते हैं।

  • डिजिटल प्लेटफॉर्म और शिक्षा में सही और निष्पक्ष जानकारी के माध्यम से युवा पीढ़ी में वैचारिक चेतना और आलोचनात्मक सोच विकसित की जा सकती है।

  • राजनीतिक औज़ार के रूप में लगातार इस्तेमाल होने पर ये सामाजिक ध्रुवीकरण, असहमति दबाने और लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करने का कारण बन सकते हैं।

  • मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रचारित संदेशों में भ्रम और अतिशयोक्ति जनता के निर्णय को प्रभावित कर सकती है।

  1. शिक्षा और सांस्कृतिक जागरूकता – स्कूल, कॉलेज और सामाजिक मंचों पर निष्पक्ष जानकारी और बहुलतावादी दृष्टिकोण।

  2. मीडिया साक्षरता – जनता को डिजिटल और सोशल मीडिया में संदेशों के प्रभाव और व्याख्या का ज्ञान।

  3. राजनीतिक नैतिकता – सत्ता और चुनावी लाभ के लिए धार्मिक या सांस्कृतिक भावनाओं का दुरुपयोग न किया जाए।

  4. सामाजिक संवाद – विभिन्न समुदायों के बीच बातचीत और सहयोग को बढ़ावा देना।

21वीं सदी में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व दोनों ही आदर्श और राजनीतिक औज़ार के रूप में काम कर रहे हैं।

  • आदर्श रूप में: समाज में सांस्कृतिक चेतना, पहचान और गौरव को मजबूत करना।

  • राजनीतिक औज़ार के रूप में: सत्ता, चुनावी लाभ और ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल।

असल चुनौती यह है कि जनता, समाज और मीडिया इस शक्ति का प्रयोग सकारात्मक और समावेशी दिशा में कर सकें।

  • यदि ऐसा हुआ, तो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व समाज को मजबूत, एकजुट और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बना सकते हैं।

  • यदि नहीं, तो ये केवल विभाजन, असहमति और राजनीतिक संघर्ष के उपकरण बनकर रह जाएंगे।


लोकतंत्र को कमजोर करने वाले कदम

  1. UAPA और राजद्रोह कानून का दुरुपयोग
  2. सरकार से असहमत होना = आतंकवाद का समर्थन
  3. नागरिकता संशोधन कानून (CAA-NRC):
  4. धर्म के आधार पर नागरिकता का विचार पहली बार सामने आया।
  5. बेरोज़गारी, महंगाई और किसान आंदोलन पर चुप्पी
  6. राष्ट्रवाद का प्रयोग इन मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए


“राष्ट्रवाद” और “हिंदुत्व” कोई समस्या नहीं हैं —
समस्या तब है जब इन्हें राजनीतिक सत्ता बनाए रखने के लिए तोड़ा-मरोड़ा जाए।

एक नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम:

अंधभक्ति से बचें

सवाल पूछें

संविधान की रक्षा करें

और यह समझें कि असली देशभक्त वही है जो सत्य के साथ खड़ा होता है, सत्ता के साथ नहीं।


यह लेख किसी धार्मिक भावना को आहत करने का उद्देश्य नहीं रखता, बल्कि लोकतांत्रिक आलोचना और नागरिक चेतना को बढ़ावा देने के लिए लिखा गया है।



सचिन "निडर"

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