राजनैतिक कटु-सत्य: सत्ता, मोह और जनता का दर्द
Political Truth
राजनैतिक कटु-सत्य: सत्ता, मोह और जनता का दर्द
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प्रणाम दोस्तों,
कभी–कभी लगता है राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जनता की याददाश्त और नेताओं की नीयत का इम्तिहान है। चुनाव आते ही नेता जनता के घर-घर पहुँच जाते हैं—कभी पैर छूते हैं, कभी बच्चों को गोद में उठा लेते हैं, कभी ऐसी बातें बोलते हैं कि लगे जैसे देश की धड़कन वही हैं। लेकिन चुनाव जीतते ही वही नेता ऐसे गायब होते हैं जैसे वोट डालते ही जनता ने उन्हें ब्लॉक कर दिया हो।
राजनीति का यह द्वंद्व, यह छल, यह ढोंग—इसे कोई खुलकर कहने से डरता है। पर आज हम “राजनैतिक कटु-सत्य” के नाम से उसी सच्चाई का पर्दाफाश करने आए हैं—वह सच्चाई जिसे हर नागरिक रोज़ जीता है लेकिन कोई लिखता नहीं।
यह लेख राजनीति पर हमला नहीं, बल्कि ** उस मानसिकता पर प्रहार** है जो जनता से बनी राजनीति को जनता से दूर ले जाती है।
राजनीति के वादे—फ्री में मिलने वाले सपने
राजनीति में वादा करना सबसे आसान काम है।
“हम यह देंगे, वह देंगे, सबकुछ देंगे।”
चुनाव के आसपास नेता इतने वादे कर देते हैं कि यदि सारे पूरे हो जाएँ तो भारत दुनिया का सबसे विकसित देश बन जाए। परन्तु सत्ता मिलते ही—सारा जोश, सारी ऊर्जा, सारे सपने एक फाइल की तरह 'pending' हो जाते हैं।
यह कटु सत्य है कि—
चुनाव से पहले वादा मुफ्त, चुनाव के बाद याद मुफ्त।
नेता जनता से कहते हैं—
“हम आपके लिए हैं।”
लेकिन परिणाम आने के बाद लगता है—
“हम आपके लिए थे।”
सत्ता का रंग—जो जीतते ही बदल जाता है
चुनाव जीतते ही नेताओं का चेहरा चमक उठता है।
इतना मेकओवर तो फिल्म एक्टर्स भी नहीं लेते।
चुनाव के वक्त जो नेता धूल भरी सड़क पर चलते थे, वही अब बुलेटप्रूफ गाड़ियों की कतारों से घिरे रहते हैं।
जो नेता गाँवों में चौपाल पर बैठकर चाय पीते थे, अब वही पाँच-सितारा भोजन और विदेशी मीटिंग्स को प्राथमिकता देते हैं।
जनता इंतज़ार करती रह जाती है…
और नेता व्यस्त हो जाते हैं—
“मीटिंग”, “मीटिंग”, और सिर्फ़ “मीटिंग”…
राजनीति में वादा बड़ा होता है
लेकिन सत्ता का रंग उससे भी बड़ा।
जनता केवल चुनाव के समय याद आती है
राजनीति में जनता एक साधन है, लक्ष्य नहीं।
यह सबसे खतरनाक कटु-सत्य है।
नेता जनता को केवल दो समय याद करते हैं—
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चुनाव के समय
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और सोशल मीडिया फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए
बाकी साल जनता संघर्ष करती रहती है।
कभी रोजगार के लिए,
कभी शिक्षा के लिए,
कभी स्वास्थ्य के लिए,
कभी न्याय के लिए।
लेकिन राजनीति में इन सब समस्याओं का समाधान ढूँढना कठिन नहीं—
नजरअंदाज करना आसान है।
परदेशी जीवन—खुद विदेश, जनता को स्वदेश
नेताओं के बच्चे—
विदेश में पढ़ाई।
विदेश में नौकरी।
विदेश में विलासिता।
और जनता के बच्चे—
सरकारी स्कूल, टूटी डेस्क, चमकती कॉपियाँ लेकिन अंधेरी सुविधाएँ।
नेता चुनाव में कहेंगे—
“हम देश को विश्वगुरु बनाएँगे।”
लेकिन अपने बच्चों को देश के स्कूलों में पढ़ने नहीं भेजेंगे।
क्यों?
क्योंकि उन्हें पता है कि सच्चाई क्या है।
पर जनता?
वह इन्हीं वादों में सपने बुनती रहती है।
झगड़ा करवाना—राजनीति का पुराना हथियार
सत्ता की राजनीति में बांटो और राज करो आज भी सबसे पसंदीदा रणनीति है।
नेता जानते हैं कि एकजुट जनता खतरनाक होती है।
इसलिए—
धर्म के नाम पर बांटो
जाति के नाम पर बांटो
भाषा के नाम पर बांटो
प्रदेश के नाम पर बांटो
और फिर कहो—
“देश खतरे में है, हमें एकजुट रहना होगा।”
कितनी विडंबना है!
जो लोग समाज में बैर की आग जलाते हैं, वही शांति सम्मेलन के मुख्य अतिथि बन जाते हैं।
दंगे—सत्ता की सीढ़ी, जनता का घाव
जब-जब चुनाव पास आते हैं, माहौल गर्म हो जाता है।
दंगे, उपद्रव, तनाव—सब अचानक बढ़ने लगता है।
क्यों?
क्योंकि राजनीति के खेल में जनता की भावनाएँ ही सबसे आसान हथियार हैं।
नेता आग लगाते हैं,
जनता आपस में लड़ती है,
और सत्ता का खेल मज़बूत होता जाता है।
इस बीच नुकसान किसका होता है?
जनता का।
लेकिन नेता?
उन्हें तो केवल एक चीज़ चाहिए—
कुर्सी।
महामारी ने राजनीति की असलियत दिखा दी
कोविड के समय जनता तड़प रही थी—
कहीं ऑक्सीजन नहीं,
कहीं अस्पताल नहीं,
कहीं दवाई नहीं।
लोग अपने प्रियजनों को खो रहे थे।
सड़कों पर अफरा-तफरी थी।
और नेता?
वह कैमरों के सामने मास्क पहनकर फोटो खिंचवा रहे थे।
“रिलीफ वर्क” लिखकर पोस्ट डाल रहे थे।
सोशल मीडिया टीम्स 24/7 एक्टिव थीं—लेकिन सुविधा असल में कहाँ थी?
महामारी में जनता ने राजनीति का असली चेहरा देख लिया—
जहाँ मौतें गिनी जाती थीं, और नेता लाइक्स।
युवाओं का उपयोग—वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं
भारत की जनसंख्या में सबसे बड़ा हिस्सा युवा हैं।
और राजनीति में उन्हें बस एक ही भूमिका दी गई है—
वोटर की।
युवा बेरोजगार है?
चिंता मत करो।
उसे चुनाव में भाषण सुनने के लिए बुला लो।
युवा परेशान है?
उसे झंडा उठवा दो।
युवा सवाल पूछ रहा है?
उसे विरोधी पार्टी का बताया जाता है।
राजनीति युवाओं को दिशा नहीं,
सिर्फ़ उपयोग देना जानती है।
राजनीति की बीमारी—दिखावा
राजनीति का धर्म आज सिर्फ एक है—
दिखावा।
विकास का दिखावा
साफ छवि का दिखावा
जनता-प्रेम का दिखावा
काम का दिखावा
असलियत?
सब जानते हैं।
लेकिन कोई बोलता नहीं।
मीडिया दिखावा करता है,
नेता दिखावा करते हैं,
और जनता?
उसके पास मजबूरी होती है—वह सच्चाई जानकर भी चुप रहती है।
समाधान जनता के हाथ में, नेताओं के नहीं
राजनीति को बदलने वाली शक्ति जनता के पास है।
लेकिन जनता भूल जाती है।
सबसे बड़ा कटु-सत्य यही है—
हम वोट देकर भूल जाते हैं कि निगरानी भी हमारी जिम्मेदारी है।
नेता अपनी नीयत के हिसाब से नहीं,
जनता की जागरूकता के हिसाब से बदलते हैं।
राजनीति का ये खेल तभी सुधरेगा जब—
जनता सवाल पूछे
युवा जागरूक हो
वोट भावनाओं पर नहीं, काम पर पड़े
नेता को याद रहे कि सत्ता सेवा है, भोग नहीं
समाधान जनता पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर है…
क्योंकि जनता बदलेगी, तो राजनीति बदलेगी।
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कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
कटु सत्य इस दौर का,
लिखता नही है कोय।
राष्ट्र नाम की मुहर लगा,
मुक्ति मिले जय होय।
सत्ता मिलते रंगत बदले,
जनता को बिसरावै।
हेर-फेर कर काज दिखावै,
खुद भर मेवा खावै।
परदेशी जीवन अपनावे।
बिटवन को परदेश पढावे,
मौसम ज्यो चुनाव सर आवै,
ज्ञान स्वदेशी भर-भर बांचे।
आपस में जो बैर करावै,
भाई-भाई को लड़वावै।
दंगों की बारिश करवावै,
खुद मिल सत्ता सुख अपनावे।
हे रघुवर कुछ करो उपाय,
इनसे तो बचवावो।
काम-क्रोध और मोह विराजे,
नैया पार करा दो।
सचिन 'निडर'

2 Comments
बिलकुल सही
ReplyDeleteधन्यवाद।
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