अब तो मैं बे-पीर हूं...
अब तो मैं बे-पीर हूं...
कुछ लोगों की जिंदगी में दर्द कोई एक घटना बनकर नहीं आता।
वह धीरे-धीरे आता है।
किसी भरोसे के टूटने से थोड़ा-सा,
किसी अपने के बदल जाने से थोड़ा-सा,
किसी उम्मीद के पूरा न होने से थोड़ा-सा,
और फिर न जाने कितनी छोटी-छोटी बातों से जुड़ता चला जाता है।
पहले आदमी हर चोट को अलग-अलग महसूस करता है।
किसी की बात चुभती है तो मन खराब होता है।
किसी के बदल जाने पर सवाल उठता है।
किसी के दूर जाने पर मन उसे रोकना चाहता है।
किसी अपने से मिली बेरुखी समझ में नहीं आती।
फिर एक वक्त आता है जब आदमी इन सबका हिसाब रखना छोड़ देता है।
यह नहीं कि उसे कुछ महसूस होना बंद हो जाता है।
बस वह हर महसूस हुई चीज को जताना बंद कर देता है।
शायद यही फर्क है पहले और अब में।
पहले किसी के व्यवहार से मेरा दिन खराब हो जाता था।
अब होता है, लेकिन पूरा दिन नहीं ले जाता।
पहले किसी के एक शब्द पर घंटों सोचता था कि उसने ऐसा क्यों कहा।
अब कभी-कभी सुनता हूं, चुप रहता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।
पहले लगता था कि जिसे अपना माना है, उसे हर हाल में अपना बनाए रखना चाहिए।
अब लगता है कि अपना होना किसी के कहने से नहीं होता।
कुछ लोग बहुत पास आकर भी अपने नहीं होते।
कुछ दूर रहकर भी मन में अपनी जगह बना लेते हैं।
किसी को रोक लेने से रिश्ता नहीं बचता।
और किसी के चले जाने से रिश्ता झूठा भी नहीं हो जाता।
कुछ रिश्तों का बस इतना ही हिस्सा हमारे साथ लिखा होता है।
वे आते हैं।
कुछ देते हैं।
कुछ ले जाते हैं।
और फिर चले जाते हैं।
पीछे कुछ यादें बचती हैं, कुछ सवाल और कभी-कभी एक ऐसी खामोशी, जिसका कोई नाम नहीं होता।
इंसान उस खामोशी के साथ भी जीना सीख लेता है।
शुरुआत में मुश्किल लगता है।
बहुत मुश्किल।
कमरे में अकेले बैठना मुश्किल।
पुरानी बातें याद न करना मुश्किल।
फोन उठाकर किसी का हाल न पूछना मुश्किल।
किसी का नाम सामने आए और बिना कुछ महसूस किए आगे निकल जाना मुश्किल।
लेकिन मुश्किल चीजें भी हमेशा मुश्किल नहीं रहतीं।
समय उनका रंग बदल देता है।
जो दर्द कभी ताजा था, वह धीरे-धीरे पुराना होता जाता है।
फिर उसकी चुभन कम होने लगती है।
और एक दिन पता चलता है कि जिस बात को सोचकर कभी रात कटती नहीं थी, आज उसी बात पर बस एक लंबी सांस निकलती है।
बस।
शायद दर्द का भी एक समय होता है।
वह आता है।
अपना हिस्सा लेता है।
और फिर उतना ही रह जाता है, जितना हम उसे रहने देते हैं।
लेकिन कुछ दर्द जल्दी नहीं जाते।
उनके लिए आदमी को थोड़ा ज्यादा समय चाहिए।
कभी-कभी कई साल।
और कभी-कभी पूरी जिंदगी।
ऐसे दर्द बाहर से दिखाई भी नहीं देते।
आदमी बिल्कुल सामान्य रहता है।
हंसता है।
लोगों के बीच बैठता है।
काम करता है।
घर लौटता है।
सोता है।
फिर अगले दिन वही सब दोहराता है।
लोग समझते हैं कि सब ठीक है।
और शायद आदमी भी धीरे-धीरे यही मानने लगता है।
क्योंकि हर दिन अपने दुख को पहचानना भी तो संभव नहीं।
जिंदगी को चलाना होता है।
जिम्मेदारियां होती हैं।
अपने लोग होते हैं।
कुछ लोग आपसे उम्मीद लगाए बैठे होते हैं।
इसलिए कई बार आदमी अपने दुख से पहले दूसरों की जरूरतों को देखता है।
अपना मन पीछे रखकर आगे बढ़ता रहता है।
और शायद इसी तरह बहुत-सी पीर भीतर जमा होती जाती है।
बिना शोर के।
बिना शिकायत के।
एक अजीब बात है जिंदगी में।
जो लोग सबसे ज्यादा सहते हैं, जरूरी नहीं कि वे सबसे ज्यादा बोलें।
कई लोग अपने दुख को शब्द नहीं देते।
वे बस अपना काम करते हैं और लौट आते हैं।
उनके बारे में कोई नहीं जानता कि वे रास्ते में कितनी बार भीतर से टूटे।
कोई नहीं जानता कि उन्होंने कितनी बातें सिर्फ इसलिए नहीं कहीं क्योंकि कहने से कुछ बदलने वाला नहीं था।
मैंने भी कई बार यही किया है।
कुछ बातें कह सकता था।
नहीं कहीं।
कुछ लोगों से पूछ सकता था कि ऐसा क्यों किया।
नहीं पूछा।
कुछ जगह अपना पक्ष रख सकता था।
चुप रहा।
हर बार इसलिए नहीं कि सामने वाला सही था।
कई बार इसलिए कि मन थक चुका था।
बार-बार खुद को समझाना भी थका देता है।
हर रिश्ते को बचाने की कोशिश भी थका देती है।
हर बार उम्मीद लगाना और फिर उसके टूटने का इंतजार करना भी थका देता है।
एक उम्र के बाद आदमी शायद थककर नहीं, समझकर चुप होता है।
अब मुझे हर किसी से कुछ कहना नहीं है।
हर किसी से कुछ पाना भी नहीं है।
जो समझना है, समझे।
जो नहीं समझना है, उसकी भी अपनी जिंदगी है।
किसी को मेरे बारे में क्या राय बनानी है, यह अब मेरे हिस्से की चिंता नहीं।
मैंने अपने हिस्से की बहुत सारी चिंताएं पहले ही ढो ली हैं।
अब कुछ बोझ रास्ते में छोड़ देने का समय है।
शायद इसलिए अब किसी के आने की खुशी में पूरा संसार नहीं देखता और किसी के जाने को पूरी दुनिया का अंत भी नहीं मानता।
आदमी जब बहुत कुछ देख लेता है तो उसकी आंखें बंद नहीं होतीं।
बस वह सब कुछ देखकर भी हर चीज पर प्रतिक्रिया देना छोड़ देता है।
उसे पता चल जाता है कि कुछ बातें बोलने से छोटी नहीं होतीं।
कुछ बातें बोलने से और बड़ी हो जाती हैं।
कुछ लोगों को जवाब देना उन्हें महत्व देना है।
और कुछ जगहों से चुपचाप निकल आना ही ठीक होता है।
इस चुप्पी में कोई घमंड नहीं है।
बस थोड़ी थकान है।
थोड़ी समझ है।
और शायद अपने लिए बचा हुआ थोड़ा-सा सम्मान भी।
फिर एक दिन जाने किस क्षण मन ने ये चार पंक्तियां लिख दीं—
चख न लेना भूलवश,
सागर का खारा नीर हूं।
पीर सारी पी चुका हूं,
अब तो मैं बे पीर हूं।
सचिन 'निडर'
बस।
इसके आगे उस वक्त कुछ लिखने का मन नहीं हुआ।
क्योंकि कुछ बातें पूरी होने के बाद भी अधूरी लगती हैं।
और कुछ बातें अधूरी होकर भी पूरी होती हैं।
यह भी शायद वैसी ही बात थी।
बहुत कुछ कह देने के बाद भी बहुत कुछ बचा रह गया।
शायद बचना ही चाहिए।
क्योंकि हर कहानी का हर पन्ना सबके सामने खोल देना जरूरी नहीं होता।
कुछ पन्ने सिर्फ इसलिए बचे रहते हैं कि आदमी खुद को याद दिला सके कि वह वहां से होकर आया है।
वहां से, जहां चीजें आसान नहीं थीं।
जहां भरोसा हमेशा सुरक्षित नहीं था।
जहां साथ हमेशा स्थायी नहीं था।
जहां अपनी ही उम्मीद कई बार अपने खिलाफ खड़ी हो जाती थी।
लेकिन आदमी वहां से निकला।
यह छोटी बात नहीं।
अब जब पीछे देखता हूं तो कुछ चेहरों पर गुस्सा नहीं आता।
कुछ नाम याद आते हैं, फिर चले जाते हैं।
कुछ घटनाएं याद आती हैं, फिर उनका असर उतना नहीं रहता।
कुछ दुख अब भी हैं, लेकिन वे रोज का हिस्सा नहीं हैं।
शायद दर्द के साथ भी एक रिश्ता बन जाता है।
पहले वह दुश्मन लगता है।
फिर पहचान का हिस्सा।
और बहुत समय बाद वह बस एक पुरानी चीज रह जाता है, जिसे देखकर आदमी सोचता है—हां, यह भी मेरे साथ हुआ था।
बस इतना।
कोई शोर नहीं।
कोई नाटक नहीं।
कोई शिकायत नहीं।
जिंदगी में हर चीज को बड़ा बनाकर जीना भी तो जरूरी नहीं।
कुछ चीजों को छोटा होते हुए देखना भी अच्छा लगता है।
कुछ यादों का फीका पड़ना भी अच्छा लगता है।
कुछ नामों का मन से उतर जाना भी अच्छा लगता है।
और कुछ उम्मीदों का मर जाना भी शायद जरूरी होता है।
क्योंकि हर उम्मीद को जिंदा रखना अपने साथ ज्यादती है।
अब मुझे किसी से यह नहीं कहना कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ।
जो हुआ, हुआ।
जिसे रहना था, रहा।
जिसे जाना था, गया।
जिसने समझा, उसने समझा।
जिसने नहीं समझा, उसके लिए मेरे पास अब भी कोई शिकायत नहीं।
जिंदगी शायद इतनी ही है।
हम कुछ लोगों को अपना मानते हैं और वे कुछ समय के बाद अजनबी हो जाते हैं।
हम कुछ जगहों को घर समझते हैं और फिर एक दिन वहां जाने का मन नहीं करता।
हम कुछ सपनों के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं और फिर उनसे आगे निकल जाते हैं।
और इस सबके बीच हम खुद भी धीरे-धीरे बदलते रहते हैं।
पहले जो बात बहुत बड़ी थी, अब छोटी लगती है।
पहले जो कमी बहुत सताती थी, अब उसके साथ जीना आता है।
पहले जो अकेलापन डराता था, अब कभी-कभी वही सबसे सच्ची संगत लगता है।
क्योंकि अकेले में आदमी को कम से कम किसी के सामने अभिनय तो नहीं करना पड़ता।
वह जैसा है, वैसा रह सकता है।
न मुस्कान उधार लेनी पड़ती है।
न किसी दुख को छिपाना।
न किसी खुशी का दिखावा।
बस खुद के साथ बैठना।
और शायद खुद के साथ बैठते-बैठते आदमी को पता चलता है कि बाहर की दुनिया से ज्यादा शोर तो उसके भीतर था।
वह शोर धीरे-धीरे कम होता है।
फिर एक दिन आदमी को एहसास होता है कि वह अब पहले जैसा नहीं रहा।
उसने दर्द को खत्म नहीं किया।
उसने बस दर्द को अपनी जिंदगी का मालिक बनने नहीं दिया।
शायद यही फर्क है।
मैं अब भी वही आदमी हूं जो महसूस करता है।
जो दुखी होता है।
जो खुश होता है।
जो किसी की बात से आहत भी होता है।
जो किसी के अपनापन मिलने पर भीतर से भर भी जाता है।
फर्क सिर्फ इतना है कि अब हर चीज मुझे अपने साथ बहा नहीं ले जाती।
कुछ चीजें आती हैं।
छूती हैं।
और निकल जाती हैं।
कुछ रुकती हैं।
उनसे बात होती है।
फिर वे भी चली जाती हैं।
मैं अपनी जगह रह जाता हूं।
और शायद यही रह जाना जरूरी है।
इतना कुछ खोने के बाद भी अपने भीतर कुछ बचा रहना जरूरी है।
एक इंसान।
एक संवेदनशील मन।
थोड़ी-सी उम्मीद।
कुछ शब्द।
और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की इच्छा।
बाकी सब आता-जाता रहेगा।
लोग भी।
समय भी।
हालात भी।
दर्द भी।
लेकिन अब हर बार टूटकर फिर से शुरू करने की जरूरत नहीं लगती।
अब जहां हूं, वहीं से आगे बढ़ना है।
बिना किसी शिकायत के।
बिना किसी हिसाब के।
जो बीत गया, उसे उसकी जगह रहने देना है।
और जो सामने है, उसे जीना है।
शायद यही कारण है कि अब पुराने दर्द मुझे डराते नहीं।
वे याद आते हैं, लेकिन रोकते नहीं।
कुछ घाव अब भी हैं, लेकिन उनसे खून नहीं बहता।
कुछ नाम अब भी याद हैं, लेकिन उनसे कोई उम्मीद नहीं।
कुछ बातें अब भी याद हैं, लेकिन उनसे कोई सवाल नहीं।
शायद यही वह जगह है जहां आदमी दर्द से बाहर नहीं निकलता—
बल्कि दर्द से आगे निकल जाता है।
और शायद वहीं जाकर मन बहुत धीरे से कहता है—
अब तो मैं बेपीर हूं।
— सचिन 'निडर'
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