कलम नहीं बिकने दूँगा...



कलम नहीं बिकने दूँगा...



कलम नहीं बिकने दूँगा, मैं अपने मरने तक...hindistambh




कलम नहीं बिकने दूँगा...

कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर लिखता क्यों हूँ?

क्या बदल जाता है मेरे लिख देने से?

किसी व्यवस्था की नींद खुल जाती है क्या?
किसी गरीब की जिंदगी आसान हो जाती है क्या?
किसी गलत आदमी को अपनी गलती का एहसास हो जाता है क्या?

शायद नहीं।

फिर भी लिखता हूँ।

क्योंकि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें मन के भीतर दबाकर रखना मुश्किल होता है।

जब अपने आसपास कुछ गलत होता हुआ देखता हूँ, किसी के साथ अन्याय होता देखता हूँ, किसी कमजोर की आवाज दबती देखता हूँ या फिर सच को सुविधा के हिसाब से बदलते हुए देखता हूँ, तो मन में एक बेचैनी पैदा होती है।

और उस बेचैनी का रास्ता मेरी कलम से होकर निकलता है।

मैं कोई बहुत बड़ा लेखक होने का दावा नहीं करता। न ही मेरे पास शब्दों का कोई बहुत बड़ा खजाना है।

बस जो महसूस करता हूँ, उसे अपने तरीके से लिख देता हूँ।

कभी कविता में।
कभी किसी लेख में।
कभी दो-चार पंक्तियों में।

और शायद यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है कि मैं जो लिखता हूँ, उसे कम से कम अपने मन के खिलाफ जाकर लिखने की कोशिश नहीं करता।

कलम की कीमत

आज के समय में लिखना आसान है, लेकिन सच लिखना हमेशा आसान नहीं होता।

हर तरफ अपनी-अपनी पसंद के सच हैं।

जिसके पक्ष में लिखो, वह खुश।
जिसके खिलाफ लिखो, वह नाराज।

कभी कोई कहेगा कि तुम बहुत बोलते हो।
कभी कोई कहेगा कि चुप क्यों हो?

लेकिन मैंने एक बात समझी है—

अगर कलम को हर बार यह सोचकर चलाया जाए कि कौन नाराज होगा और कौन खुश, तो फिर वह कलम अपनी नहीं रह जाती।

मैं अपनी कलम को किसी के खिलाफ नहीं, लेकिन किसी के दबाव में भी नहीं चलाना चाहता।

मुझे गलत को गलत कहने का अधिकार चाहिए और सही को सही कहने की स्वतंत्रता भी।

हो सकता है मेरी बात हमेशा सही न हो।

हो सकता है मैं भी कभी गलत साबित हो जाऊँ।

लेकिन अपनी बात कहने का साहस और अपनी गलती स्वीकार करने की ईमानदारी—शायद यही लेखन की असली परीक्षा है।

साथ सिर्फ शब्दों का नहीं होता

मैंने सोशल मीडिया और इस ब्लॉग के सफर में यह भी महसूस किया है कि लोग सिर्फ लेख नहीं पढ़ते।

वे लेखक को भी पढ़ते हैं।

वे देखते हैं कि वह किस बात पर खड़ा होता है, किस बात पर चुप रहता है और किस बात पर आवाज उठाता है।

इसलिए मेरे लिए आप सिर्फ पाठक नहीं हैं।

आप उस सफर का हिस्सा हैं जिसमें मैं अपने शब्दों के साथ आगे बढ़ रहा हूँ।

आज कोई पढ़ रहा है, कल शायद न पढ़े।

आज कोई साथ है, कल रास्ते अलग हो सकते हैं।

जिंदगी में आना-जाना तो लगा ही रहेगा।

लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए कि लोगों के बीच से विश्वास खत्म न हो।

क्योंकि आदमी आदमी से ही तो बनता है।

अगर इंसान को इंसान पर ही भरोसा नहीं रहेगा, तो फिर शब्द किस काम के?

इसीलिए आज मन में आया कि आपसे बस इतना कह दूँ—

आना-जाना लगा रहेगा,
साथ बनाए रखिएगा।

इंसान का इंसानों पर
विश्वास बनाए रखिएगा।

कलम नहीं बिकने दूँगा मैं
अपने मरने तक,
मेरी आवाज़ की एक
पहचान बनाए रखिएगा।

एक वादा खुद से

मैं नहीं जानता कि मेरी कलम कितने लोगों तक पहुँचेगी।

यह भी नहीं जानता कि मेरे लिखे हुए शब्द किसी के जीवन में कोई बदलाव ला पाएँगे या नहीं।

लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि जब तक लिखने की ताकत है, कोशिश करूँगा कि शब्दों को सिर्फ लोकप्रिय होने के लिए न बेचूँ।

तालियाँ मिलें तो अच्छी बात है।

आलोचना मिले तो उससे भी सीखूँगा।

लेकिन अपनी बात कहने की स्वतंत्रता किसी कीमत पर नहीं खोना चाहता।

क्योंकि मेरे लिए कलम सिर्फ लिखने का साधन नहीं है।

यह मेरे भीतर की आवाज है।

और अपनी आवाज को बेचकर हासिल की गई खामोशी मुझे मंजूर नहीं।

इसलिए शायद आज अपने आप से यही कह सकता हूँ—

कलम नहीं बिकने दूँगा मैं
अपने मरने तक।

और आपसे सिर्फ इतनी उम्मीद है कि मेरी बात से हमेशा सहमत मत होना।

सवाल करना।

असहमति जताना।

गलती हो तो बताना।

लेकिन संवाद बनाए रखना।

क्योंकि लेखक और पाठक के बीच सबसे खूबसूरत रिश्ता सहमति का नहीं, विश्वास का होता है।

और आखिर में फिर वही चार पंक्तियाँ, जो आज मेरे मन की बात बन गई हैं—

आना-जाना लगा रहेगा,
साथ बनाए रखिएगा।

इंसान का इंसानों पर
विश्वास बनाए रखिएगा।

कलम नहीं बिकने दूँगा मैं
अपने मरने तक,
मेरी आवाज़ की एक
पहचान बनाए रखिएगा।

सचिन 'निडर'  

बस इतना ही कहना है।

मिलते रहिएगा... पढ़ते रहिएगा...

और जहाँ लगे कि मैं गलत हूँ, वहीं रोककर बताइएगा।

क्योंकि सफर अकेले शब्दों से नहीं, अपने लोगों के साथ से पूरा होता है।

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