सुनिए सरकार... अब जनता बोल रही है



सुनिए सरकार... अब जनता बोल रही है...


भारत पूछ रहा है आखिर दोषी कौन है - भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, पेपर लीक, महँगाई और लोकतंत्र पर आधारित एक सांकेतिक स्केच
"यह स्केच किसी एक सरकार या दल का नहीं, बल्कि उन सवालों का प्रतीक है जो आज करोड़ों भारतीयों के मन में हैं।"


सुनिए सरकार... अब जनता बोल रही है...



"हम सत्ता नहीं माँगते। हम केवल इतना चाहते हैं कि इस देश में सच बोलना गुनाह न बने, सवाल पूछना देशद्रोह न कहलाए और मेहनत करने वाले को उसका हक़ मिले।"

हम इस देश के आम नागरिक हैं।

हम वही लोग हैं जो हर सुबह काम पर निकलते हैं, शाम को थके हुए घर लौटते हैं, हर महीने टैक्स देते हैं, बिजली का बिल भरते हैं, बच्चों की फीस जमा करते हैं और हर पाँच साल में उँगली पर स्याही लगाकर लोकतंत्र को मजबूत करने का अपना कर्तव्य निभाते हैं।

हम कोई उद्योगपति नहीं हैं, हम कोई बड़े नेता नहीं हैं, हम टीवी स्टूडियो में बैठकर बहस करने वाले विशेषज्ञ भी नहीं हैं, हम बस इस देश की वह खामोश भीड़ हैं, जिसके कंधों पर भारत खड़ा है।

बस अब हम चुप नहीं रहना चाहते।

आज हम पूछना चाहते हैं...

आख़िर इस देश में आम आदमी की आवाज़ सबसे आख़िर में ही क्यों सुनी जाती है?


Always Raise your Voice against wrong



हमें भारत पर गर्व है।

जब चंद्रयान चाँद पर पहुँचता है, हमारा सीना चौड़ा हो जाता है।

जब कोई भारतीय वैज्ञानिक दुनिया में नाम कमाता है, हमें खुशी होती है।

जब भारतीय खिलाड़ी तिरंगा ऊँचा करते हैं, हमारी आँखें नम हो जाती हैं।

जब नई सड़कें बनती हैं, नए एक्सप्रेस-वे खुलते हैं, डिजिटल भुगतान पूरी दुनिया में उदाहरण बनता है, तब हमें लगता है कि हमारा देश आगे बढ़ रहा है।

लेकिन इसी गर्व के बीच कुछ सवाल भी हैं।

अगर सब कुछ ठीक चल रहा है...तो फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में इतनी बेचैनी क्यों है?

क्यों छात्र सड़कों पर हैं?

क्यों किसान बार-बार आंदोलन करने को मजबूर होते हैं?

क्यों लाखों युवा भर्ती परीक्षाओं और रोजगार को लेकर निराश दिखाई देते हैं?

क्यों आम नागरिक को आज भी छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?

ये सवाल किसी एक सरकार से नहीं हैं।

ये सवाल उस व्यवस्था से हैं, जिसे हमने मिलकर बनाया है।


हमने पिछले कुछ वर्षों में कई तरह के आंदोलन देखे।

कहीं परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठे।

कहीं नियुक्तियों में देरी पर प्रदर्शन हुए।

कहीं किसान अपनी आय और फसलों को लेकर सड़क पर उतरे।

कहीं पर्यावरण बचाने के लिए स्थानीय समुदायों ने आवाज़ उठाई।

कहीं नागरिकों ने पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग की।

हर आंदोलन सही हो, यह ज़रूरी नहीं।

लेकिन जब अलग-अलग वर्ग अलग-अलग मुद्दों पर एक जैसी बेचैनी व्यक्त करने लगें, तो यह संकेत होता है कि संवाद की आवश्यकता बढ़ गई है।

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होता।

वह तब मजबूत होता है जब सरकार सुनती है, विपक्ष सार्थक प्रश्न पूछता है, संस्थाएँ निष्पक्ष रहती हैं और नागरिक तथ्य के आधार पर अपनी बात रखते हैं।


सबसे अधिक चिंता हमें अपने युवाओं की है, हमारे बच्चे बचपन से सुनते हैं—

"मेहनत करो, सफलता मिलेगी।"

वे वर्षों तक पढ़ते हैं, कोचिंग करते हैं, परिवार अपनी बचत लगा देता है, कई माता-पिता कर्ज़ तक लेते हैं।

फिर जब परीक्षा रद्द होती है, अनियमितताओं के आरोप लगते हैं या भर्ती वर्षों तक अटक जाती है, तो केवल एक परीक्षा नहीं रुकती...

विश्वास भी टूटता है, किसी भी देश की सबसे बड़ी पूँजी उसकी युवा पीढ़ी होती है।

अगर वही अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह केवल रोजगार का नहीं, राष्ट्र के आत्मविश्वास का प्रश्न बन जाता है।


महँगाई पर भाषण देना आसान है।

लेकिन रसोई चलाना आसान नहीं।


भारत में बढ़ती महंगाई की समस्या


जिस घर में महीने की आय सीमित हो, वहाँ हर बढ़ती कीमत एक नई चिंता बन जाती है।

दूध महँगा हो, दाल महँगी हो, स्कूल की फीस बढ़ जाए, दवा का खर्च बढ़ जाए—तो आर्थिक विकास के बड़े-बड़े आँकड़े भी उस परिवार को राहत नहीं दे पाते।

किसी देश की प्रगति केवल उसकी GDP से नहीं मापी जाती।

यह भी देखा जाता है कि आम नागरिक की जेब, उसका स्वास्थ्य, उसकी शिक्षा और उसका भविष्य कितना सुरक्षित है।


हमें सरकार से शिकायत इसलिए नहीं है कि वह हर समस्या एक दिन में हल नहीं कर सकती।

कोई भी सरकार ऐसा नहीं कर सकती।

लेकिन हमें तब पीड़ा होती है जब कठिन सवालों के जवाब की जगह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं।

हमें जवाब चाहिए।

स्पष्टीकरण चाहिए।

समय पर कार्रवाई चाहिए।

लोकतंत्र में जनता मालिक नहीं तो कम से कम भागीदार तो है।

और भागीदार सवाल पूछता है।


हम विपक्ष से भी कुछ कहना चाहते हैं।

आपका काम केवल हर निर्णय का विरोध करना नहीं है।

आपका काम देश को बेहतर विकल्प देना भी है।

अगर सरकार गलती करे तो उसे तथ्य के साथ घेरिए।

लेकिन अगर कोई अच्छा काम हो, तो उसे स्वीकार करने का साहस भी रखिए।

जनता को शोर नहीं...समाधान चाहिए।


आज सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि देश में समस्याएँ हैं। समस्याएँ हर देश में होती हैं।

सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब लोग यह मानने लगते हैं कि उनकी बात कोई सुनना ही नहीं चाहता।

यहीं से अविश्वास जन्म लेता है। और जब अविश्वास बढ़ता है, तो समाज धीरे-धीरे दो हिस्सों में बँटने लगता है—

एक जो हर बात पर ताली बजाता है। दूसरा जो हर बात का विरोध करता है।

लेकिन हम न ताली बजाने आए हैं...न विरोध करने।

हम केवल सच जानना चाहते हैं। क्योंकि यह देश केवल सरकार का नहीं...

केवल विपक्ष का नहीं...

यह देश हमारा भी है।

और जब घर हमारा है, तो सवाल पूछने का अधिकार भी हमारा है।

सवाल केवल सरकार से नहीं, व्यवस्था से भी है

अगर किसी राष्ट्र को बाहर से हराना मुश्किल हो, तो उसे भीतर से कमज़ोर कर दीजिए।

भ्रष्टाचार बढ़ा दीजिए, शिक्षा पर से भरोसा हटा दीजिए, युवाओं के सपनों को अनिश्चितता में डाल दीजिए।

संस्थाओं पर सवाल खड़े होने दीजिए, बाक़ी काम समाज खुद कर देगा।

हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी आबादी नहीं, उसका भरोसा है। और सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब यही भरोसा धीरे-धीरे टूटने लगे।

भ्रष्टाचार: नुकसान केवल पैसों का नहीं, विश्वास का भी

हम अक्सर भ्रष्टाचार को रिश्वत तक सीमित कर देते हैं। लेकिन क्या भ्रष्टाचार केवल वही है?

क्या घटिया निर्माण करके पुल गिरा देना भ्रष्टाचार नहीं? क्या किसी परियोजना को वर्षों तक लटकाए रखना भ्रष्टाचार नहीं? क्या योग्यता के बजाय पहुँच को महत्व देना भ्रष्टाचार नहीं?

क्या सरकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक न पहुँचना भ्रष्टाचार नहीं?

Transparency International की Corruption Perceptions Index में भारत की स्थिति यह बताती है कि पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही को और मजबूत करने की आवश्यकता है। यह किसी एक सरकार का नहीं, दशकों से चली आ रही व्यवस्था का प्रश्न है।

हम पूछना चाहते हैं—

अगर हमारा टैक्स ईमानदारी से लिया जाता है, तो उसका हर रुपया ईमानदारी से खर्च क्यों नहीं होता?

पेपर लीक: एक परीक्षा नहीं, पूरी पीढ़ी का मनोबल टूटता है

हर वर्ष करोड़ों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कई वर्षों तक पढ़ते हैं, त्योहार छोड़ देते हैं, दोस्तों से दूरी बना लेते हैं, परिवार उम्मीद बाँध लेता है कि इस बार मेहनत रंग लाएगी।

लेकिन जब किसी परीक्षा पर पेपर लीक, अनियमितता या रद्द होने का साया पड़ता है, तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, लाखों सपनों पर असर पड़ता है।

सरकारों ने परीक्षा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नए कानून और सख्त व्यवस्थाओं की घोषणा की है। यह सकारात्मक कदम है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब ऐसी घटनाएँ वास्तव में कम होती दिखाई दें और दोषियों को समय पर सज़ा मिले।

युवा केवल आश्वासन नहीं चाहता।

उसे भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत का मूल्य सुरक्षित है।

बेरोज़गारी: आँकड़ों से आगे की कहानी

रिपोर्टें अलग-अलग तस्वीर दिखाती हैं। कुछ क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा है, कुछ में चुनौतियाँ बनी हुई हैं। असंगठित क्षेत्र, स्वरोज़गार और गिग इकॉनमी का विस्तार हुआ है, लेकिन स्थायी और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की माँग भी लगातार बढ़ी है।

हम यह नहीं कहते कि देश में कोई काम नहीं है।

हम यह पूछते हैं—क्या हमारे युवाओं की शिक्षा और उपलब्ध रोजगार के बीच सही मेल बन पाया है?

क्या कौशल विकास उतनी ही तेजी से हुआ, जितनी तेजी से तकनीक बदली?

क्या छोटे शहरों और गाँवों के युवाओं को भी समान अवसर मिल रहे हैं?

अगर इन सवालों का जवाब अधूरा है, तो सुधार की गुंजाइश भी मौजूद है।

जंगल: विकास की कीमत कितनी होनी चाहिए?

हमें सड़कें चाहिए।

हमें उद्योग चाहिए।

हमें बिजली चाहिए।

लेकिन हमें हवा भी चाहिए।

हमें नदियाँ भी चाहिए।

हमें जंगल भी चाहिए।

भारत की Forest Survey of India की रिपोर्टें बताती हैं कि कुल वनावरण की तस्वीर मिश्रित है—कुछ क्षेत्रों में सुधार हुआ है, जबकि कुछ स्थानों पर विकास परियोजनाओं, खनन, शहरी विस्तार और अन्य कारणों से पर्यावरणीय दबाव बना हुआ है।

हम विकास का विरोध नहीं करते। हम केवल यह चाहते हैं कि विकास ऐसा हो, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करें, पछताएँ नहीं।

एथेनॉल: हर नीति पर सवाल पूछना ज़रूरी है

पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का उद्देश्य तेल आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को नया बाज़ार देना और उत्सर्जन कम करना बताया गया है।

यह एक महत्वपूर्ण नीति हो सकती है।

लेकिन क्या हमने यह भी सोचा कि—

अगर पानी की अधिक खपत वाली फसलें बढ़ेंगी तो जल संकट वाले राज्यों पर क्या असर होगा?

क्या खाद्य सुरक्षा और ईंधन नीति के बीच संतुलन बना रहेगा?

क्या छोटे किसानों को भी इसका लाभ उतना ही मिलेगा जितना बड़े उत्पादकों को?

किसी नीति पर सवाल पूछना उसका विरोध नहीं होता।

लोकतंत्र में सवाल सुधार का पहला कदम होते हैं।

क्या गाड़ियों में समस्याएं नहीं बढ़ रहीं हैं?

सरकार से हमारी अपेक्षा

हम यह नहीं कहते कि हर निर्णय गलत है, हम यह भी नहीं कहते कि हर उपलब्धि झूठी है, देश में सड़कें बनी हैं।

रेलवे में सुधार हुए हैं, डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ है, वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका भी मजबूत हुई है।

इन उपलब्धियों को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कमियों की चर्चा करना।

लेकिन जब कोई सरकार उपलब्धियों का श्रेय लेती है, तो उसे चुनौतियों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।

यही जवाबदेही है।

यही लोकतंत्र की आत्मा है।


भारत में गरीबी और भुखमरी की स्थिति – एक कड़वा सच


विपक्ष से भी कुछ सवाल

अगर सरकार से हमारा सवाल है, तो विपक्ष से भी है।

क्या केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करना पर्याप्त है?

क्या केवल संसद में नारे लगाने से जनता का विश्वास जीत लिया जाएगा?

देश को केवल आलोचना नहीं चाहिए।

देश को वैकल्पिक नीति चाहिए।

स्पष्ट दृष्टि चाहिए।

ईमानदार नेतृत्व चाहिए।

मजबूत लोकतंत्र में मजबूत सरकार जितनी ज़रूरी है, उतना ही मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष भी।

क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं...

बल्कि हर दिन जनता के प्रति जवाबदेह रहना है।

और यही जवाबदेही आने वाले समय में भारत की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।


हमने सरकार से सवाल पूछे।

विपक्ष से भी पूछे।

व्यवस्था से भी पूछे।

अब अगर हम ईमानदार हैं...

तो एक सवाल खुद से भी पूछना होगा।

क्या इस हालत के लिए केवल नेता ही जिम्मेदार हैं?

या...

हम भी कहीं न कहीं इस कहानी के किरदार हैं?


सच कड़वा है, लेकिन सच यही है कि लोकतंत्र संसद से पहले समाज में पैदा होता है, जैसी जनता होती है...

वैसी ही राजनीति धीरे-धीरे बन जाती है।

आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को आवाज़ दी है, यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

लेकिन इसी के साथ एक नई समस्या भी आई है, अब तथ्य से तेज़ अफवाह दौड़ती है। एक झूठा संदेश लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। लोग बिना जाँच किए उसे आगे भेज देते हैं।

धीरे-धीरे हम सूचना नहीं...

अपनी पसंद के अनुसार बनाई गई दुनिया देखने लगते हैं। अगर कोई खबर हमारी सोच से मेल खाती है, तो हम उसे सच मान लेते हैं। अगर वही खबर हमारी पसंद के खिलाफ़ हो, तो हम उसे "प्रोपेगेंडा" कह देते हैं।

लेकिन सच न सरकार का होता है...न विपक्ष का।

सच केवल सच होता है।


हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आज राजनीति ने समाज को कई हिस्सों में बाँट दिया है।

किसी के लिए हर सरकारी निर्णय सही होता है, किसी के लिए हर निर्णय गलत, बीच का रास्ता जैसे गायब हो गया है।

हमने बहस करना छोड़ दिया, हमने सुनना छोड़ दिया, हमने असहमति का सम्मान करना छोड़ दिया।

याद रखिए...

जिस दिन समाज केवल दो खेमों में बँट जाता है, उस दिन सबसे पहले लोकतांत्रिक संवाद मरता है।

और संवाद मर जाए...तो फिर केवल शोर बचता है।


हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं?

क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि सवाल पूछना गलत है?

क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि नेता कभी गलत नहीं हो सकता?

या यह कि हमारा पसंदीदा दल हर हाल में सही है?

अगर ऐसा है...

तो हम आने वाली पीढ़ी को नागरिक नहीं...

समर्थक बना रहे हैं।

और किसी भी लोकतंत्र के लिए अंध-समर्थक उतने ही खतरनाक होते हैं, जितने अंध-विरोधी।

देश को ऐसे नागरिक चाहिए जो सबूत देखें, प्रश्न पूछें और सही बात का समर्थन करें—चाहे वह किसी भी दल से आई हो।


हम यह नहीं चाहते कि सरकार असफल हो, क्योंकि सरकार असफल होगी...तो सबसे पहले नुकसान हमारा होगा।

हम यह भी नहीं चाहते कि विपक्ष कमजोर हो, क्योंकि कमजोर विपक्ष का अर्थ है कमजोर जवाबदेही।

हमें मजबूत सरकार भी चाहिए, मजबूत विपक्ष भी।

मजबूत न्यायपालिका भी, मजबूत मीडिया भी।

और सबसे बढ़कर...

मजबूत नागरिक चाहिए।


हमें यह तय करना होगा कि हम किस तरह का भारत चाहते हैं।

क्या ऐसा भारत...

जहाँ सवाल पूछने वाले को देशद्रोही कह दिया जाए?

या ऐसा भारत...

जहाँ सरकार भी आलोचना से सीखे, विपक्ष भी जिम्मेदारी निभाए और जनता भी तथ्यों के आधार पर राय बनाए?

क्या ऐसा भारत...

जहाँ चुनाव के समय केवल धर्म और जाति की बातें हों?

या ऐसा भारत...

जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विज्ञान, पर्यावरण और न्याय सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनें?

यह फैसला संसद नहीं करेगी।

यह फैसला हम करेंगे।


देशभक्ति का अर्थ किसी नेता से प्रेम नहीं...

देश से प्रेम है।

संविधान से प्रेम है।

सच से प्रेम है।


देश केवल दिल्ली से नहीं चलता।

देश हमसे चलता है।

और जिस दिन इस देश का आम नागरिक जाग गया...

उस दिन किसी क्रांति की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

उस दिन भारत बदलना शुरू हो जाएगा।


हिंदी स्तंभ 

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